भारत के गर्वनर का व्यान अहम, डोसा महंगा, तवा के कारण ?

विलेज टाइम्स, फरवरी 2016- सवाल सामान्य मगर जबाव समाधान सूचक अब अर्थ लोग जो भी निकाले मगर भारत के गर्वनर के व्यान में छुपा भाव यथार्थ है। बात भले ही डोसा के मंहगे होने की रही हो, मगर उनका जबाव यथार्थ के नजदीक था। कि डोसे की बड़ी कीमतों के पीछे तवा कारण है। उन्होंने थोड़ा स्पष्ट करते हुये कहा भी कि प्रौद्योगिकी नहीं बदली मगर पगार बढ़ गई। 

बात छोटी सी है मगर दूर तक झझकोरने वाली है। क्षेत्र जो भी हो मगर हर जगह स्थिति यहीं है। 
आज लेाग लाख से ऊपर की पगार तो ले रहे है मगर काम उतना नहीं कर रहे। यह लेाकतंत्र में समझने वाली बात है। 
क्योंकि वोट भगवान और सत्ता के लिये अन्धे दल पुजारी बने हुये है। इसलिये धर्म से दुराग्रह कर इस लेाकतंत्र में परलोक नहीं यह लोक भी लोग खराब कर रहे हैे। सो वोट के लिये अन्धे दल सरकारे आंखे बन्द कर तकनीक इजात करने से इतर तवे के लिये तबाह हुये जा रहे है। 
जिन्हें वोट  बैंक बढ़ाने की जंग में राष्ट्र, गांव, गली, गरीब नजर नहीं आ रहे, तथा समाज और आने वाली नस्ल का भविष्य भी नजर नहीं आ रहा, केवल और केवल वोट बैंक की खातिर अन्धी दौड़-दौड़े जा रहे है। 
ऐसा नहीं कि भारतीय लेाकतंत्र में कुछ ही दल हो, जो सत्ता में है या सत्ता से बाहर है। सभी का वोट हासिल करने लगभग एक जैसा व्यवहार है। मगर परिणाम फिलहाल नदारत है। 
हमारे महान लेाकतंत्र में विधायिका कार्यपालिका की अकर्मणता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। कि विशुद्ध रुप से देश के नागारिकों के मूल अधिकारों की रक्षा के लिये माननीय न्यायालयों को कड़ी टिप्पणी करते हुये लेागों को अधिकार सुविधायें मुहैया कराने कोर्ट कमिश्रर नियुक्त करना पढ़ रहे है। अभी महाराष्ट्र में तो यहां तक कहा गया कि संस्थायें सुविधाये न दें तो शुल्क भुगतान न किया जाये। 
सो नई-नई प्रौद्योगिकी तो दूर की कोणी, विधायिकाये न तो समय से स्वछन्द बहस कर कानून बना पा रही है, न ही कार्यपालिकाये मौजूद नीतियों का ठीक से क्रियान्वयन करा पा रही। बस सुख सुविधाये थोक बन्द बढऩे वाले वेतन भत्तों की बाढ़ आ रही है। फिर चाहे वह विधायिका हो या कार्यपालिका न ही प्राकृतिक साधनों का दोहन और न ही, नई प्रौद्योगिकी का इजात हो पा रही है। 
बढ़ती मंहगाई, पिसते लेाग परेशान है मगर न तो लेाकतंत्र को चलाने वाले, न ही अहम ओहदा स हाले बैठे नौकरशाहों , न ही सरकार में बैठे नेताओं को इस अहम सवाल का ज्ञान है। धन्य हमारा देश जिसमें कोई ऐसा गर्वनर भी है जो देश में बढ़ती मंहगाई कुव्यवस्था के बारे गहन जानकारी रखते है।  

     संकट में शराब नीति
म.प्र. के शिवपुरी जिले में शराब ठेकेदारों ने किये हाथ खड़े
शिवपुरीफरवरी 2016- वर्ष-2015-16 के लिये रिन्यूबल के पश्चात शेष देशी विदेशी मदिरा ग्रुपो को ऊंचे दामों पर ठेका लेने वाले कई व्यवसायी बड़े घाटे के चलते बीच में छोड़कर भाग गये, तो कुछ जब 16 फरवरी से रिन्यूबल तथा 3 मार्च को वर्ष 2016-17 के लिये ठेके होने के बावजूद भी दुकान छोड़ भाग रहे है। 
जिसमें बूढ़दा ग्रुप का 23 फरवरी को होने वाला पुर्निष्पादन इसका प्रमाण है। कि शराब ठेकेदारों को किस हद तक इस वर्ष नुकसान उठाना पड़ा है।  
वहीं घाटा उठा दुकान चलाने वालो की हालत यह है कि वह न तो रिन्यूबल में रिस्क उठाना चाहते है न ही नई आबकारी नीति 2016-17 के 3 मार्च को होने वाले टेन्डरो में भाग लेना चाहते है। 
वहीं आबकारी विभाग का कहना है कि वर्ष 2016-17 के लिये होने 3 मार्च 2016 को टेन्डरों की पूर्ण तैयारी की जा चुकी है जिसका क्रियान्वयन आबकारी नीति अनुसार निर्धारित कार्यक्रम के तहत किया जा रहा है। 
इस बीच स्थानीय ठेकेदारों में ल बे घाटे के चलते भले ही दिल चस्वी न बची हो, मगर यू.पी. के ठेकेदारों द्वारा समीप जिला होने के नाते अच्छी खासी दिल चस्वी दिखाई जा रही है। देखना होगा की महंगी हो चुकी दुकानों में से वर्ष 2016-17 के लिये कितनी उठ पाती है और कितनी रह जाती है। 

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