पेयजल को लेकर मच सकता है कोहराम

व्ही.एस.भुल्ले। जिस चिरनिद्रा में लीन सरकार चुनाव हार, जीत, स्वागत, बन्धन, अभिनन्दन, स मेलन, पंचायत, महापंचायतों का जश्र विगत 12 वर्षो से मनाने जुटी है शायद उसे भी पूर्व एन.डी.ए सरकार की तरह गुडफील मेहसूस हो रहा है। मगर म.प्र. में बाजीगरी के चलते गर्मी शुरु होने से पूर्व पेयजल को लेकर जनता अभी से कराहने, डकराने लगी है। पेयजल के लिये कराहते लेागों के बीच इस बार भीषण गर्मी में कहीं कोहराम न मच जाये यह चिन्ता लेागों को अभी से सताने लगी है। 


बैसे भी पेयजल तैयारी के नाम हाथ पर हाथ रखे बैठी म.प्र. सरकार और उनके अधिकारियों को आड़े हाथो लेते हुये पूर्व केन्द्रीय मंत्री, सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हीं के संसदीय क्षेत्र शिवपुरी जिले की समीक्षा बैठक में नाराजगी व्यक्त कर असंतोष जाहिर करते हुये मीडिया में कह चुके है कि पेयजल को लेकर आपातकाल जैसी स्थिति बन सकती है।  
वहीं डेढ़ लाख करोड़ से अधिक के कर्ज में डूबी म.प्र. सरकार विगत 2 वर्षो से एक भी छदम केन्द्र से न मिलने के चक्कर में प्रधानमंत्री को भरमाने प्रदेश भर के किसानों को कृषि, परिवहन, कलेक्टरों की मदद से प्रदेश भर से ढो सिहोर में इक_ा कर चुकी है। 
महाकुंभ की तैयारियों में जुटी सरकार को शायद यह अन्दाज नहीं, कि वह अल्प वर्षा और सूखे में लगभग 3000 करोड़ फूक चुकी है। 
मगर यह सबसे अहम और सबसे बड़ा यक्ष प्रश्र है कि जब भू-जल स्तर म.प्र. के कई जिलों में 800- 1000 फिट तक जा पहुंचा है। नदियां, तालाब झरने अभी से सूखने लगे है। कुये तो पहले ही अंधा-धुन्ध बोर खनन के चलते दम तोड़ चुके है। ऐसे में सरकार की तैयारियों का भी शून्य होना चिन्ता विषय है। अगर मान भी लिया जाये कि सरकार पानी की तरह पैसा बहा परिवहन या बोर बैल और खनन करा लेागों के कंठ तर कर सकती है, तो यह भी उसका मुगालता साबित न हो जाये। क्योंकि विभागीय सूत्रो का कहना है कि पेयजल संकट को लेकर न तो भोपाल में बैठे अधिकारी ही ग भीर है और न ही उनके मातहत उतने समझदार जो शासन को दबाव के चलते सत्य से अवगत करा पाये। मैदानी हकीकत ये है कि गर्मी में होने वाले आम पेयजल संकट या इस वर्ष अल्प वर्षा के चलते संभावित पेयजल संकट  को देखते हुये मैदानी अधिकारियों द्वारा जनवरी से ही वरिष्ठ कार्यालयों को स्वीकृति हेतु प्रपोजल भेजे जा रहे है। मगर उन्हें स्वीकृति देने के बजाये या तो उनमें अडंगे लगा या फिर नये-नये सुझावों के साथ बार-बार प्रपोजल मंगाने का दौर चल रहा है। जो प्रदेश की जनता ही नहीं पशु-पक्षियों की जान के साथ खिलबाड़, मगर अहंकार में डूबी सरकार को जनता की समस्याओं से रुबा रु होने की फुरसत कहा।  
अगर रसातल की ओर बढ़ता भू-जल स्तर और सूखती नदी, तालाबों, झरनो का क्रम म.प्र. में यहीं रहा तो फिर सरकार इतने लेागों के लिये पेयजल कहा से लायेगी। यहीं सबसे बड़ा सवाल लेागों के सामने है। क्योंकि व्यक्ति, पशु-पक्षी, भूखे तो कई दिनों तक रह सकते है, मगर प्यासे एक दिन भी नहीं। 
ऐसे में अगर भीषण गर्मी की कल्पना की जाये तो आदमी तो कहीं न कहीं से कैसे भी पेयजल जुटा लेगा या पलायन कर जान बचा लेगा। मगर प्रकृति में जिन्दा रहने का पूरा हक रखने वाले उन बैजुबान पशु-पक्षी, वृक्ष, पौधो का क्या होगा, जिनमें बड़े पैमाने पर जनहानि होने की अशंका है। और यहीं महा पाप कहीं हमें न ले डूबे। बेहतर हो कि सरकार व सरकार से जुड़े लेाग तत्कालिक इस महा समस्या का समाधान समय रहते खोज ले, बरना फिर न तो समझने और न ही समझाने का समय सरकार के पास शेष होगा। 
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