थोकबन्द जनप्रतिनिधियों को दो टूक जबाव

विलेज टाइम्स, म.प्र. शिवपुरी फरवरी 2016- मसला है म.प्र. में धक्के खाते पंच परमेश्वरों का अर्थात गांवों की सरकारों को चलाने एवं गांव गरीब की खुशहाली के लिये वोट से चुने जाने वाले सरपंचों का, मगर इनका दुर्भाग्य यह है कि यह संवैधानिक संस्थाओं के लिये चुने हुये जनप्रतिनिधि होने के बावजूद भी वह आजकल हाल, बैहाल है। उसी बैहाली से तृस्त अपने ही अमले की शिकायत ले, वह 10 सूत्रीय मांगों को लेकर ल बे इन्तजार के बावजूद कलेक्टर से मुखातिब थे। 


यूं तो ग्वालियर च बल संभाग के शिवपुरी जिले के विकासखण्ड खनियाधाना से शिवपुरी जिला मु यालय कलेक्टर से समय ले पहुंचे सरपंचों को सोमवार के दिन होने वाली टी.एल. एवं तत्पश्चात राजस्व बैठक के चलते कलेक्टर से मिलने ल बा इन्तजार करना पढ़ा। इस बीच एस.डी.एम., ए.डी.एम. द्वारा ज्ञापन लेने का प्रयास किया गया। 

मगर सरपंचों की कलेक्टर से सीधी मुलाकात की जिद के चलते सरपंच संगठन के कुछ लेागों को कलेक्टर से मिलवाया  गया। मगर ल बे इन्तजार के बाद कलेक्टर का जबाव सुन मौजूद जनप्रतिनिधि सन्न थे क्योंकि कलेक्टर का सटीक मगर दो टूक जबाव था। कि समस्या जिस विभाग से स बन्धित है। पहले उसे बताया जाये। जैसा कि कलेक्टर शिवपुरी अपनी पदस्थापना से लेकर आज तक या खुलेयाम जनसुनवाई कार्यक्रम में भी लेागों से कहते रहे है। और लेागों को स बन्धित व्यक्ति के पास जाने को भी बताते रहे है। 

मगर कलेक्टर से ठगा-सा जबाव सुनने के बाद चुने हुये गांव के ये जनप्रतिनिधि असंतुष्ट दिखे। जिनका तर्क था कि हम कलेक्टर के पास म.प्र. शासन सरकार के प्रतिनिधि बतौर अपनी 10 सूत्रीय मांगों को लेकर आये थे। हमें क्या पता था कि यहां भी हमें समस्या समाधान की जगह सलाह वह भी दो टूक शब्दों में मिलेगी।  हम तो 3 मांगें मनरेगा, 2 शासन पी.एच.ई. शेष जिला पंचायत से स बंधित लेकर आये थे। 

बहरहाल जो भी जिस तरह की र्दुगति फिलहाल पंचायती राज की चल रही है। वह किसी भी लेाकतंत्र के लिये उचित नहीं। क्योंकि किसी भी लेाकतंत्र में सबसे अहम सवाल यह नहीं कि किसने क्या किया, सवाल ये है। कि कितने लेागों ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन किया। सवाल जबाव अपनी-अपनी जगह सही, गलत हो सकते है। मगर लेाकतंात्रिक व्यवस्था गलत नहीं हो सकती। 

जिसकी कल्पना शहीदे आजम सुभाष बाबू, महात्मा गांधी, पण्डित दीन दयाल उपाध्याय, डॉ. लेाहिया ने कुर्बानी ही नहीं अपने कड़े संघर्ष के दौरान की होगी। मगर यह कल्पना आज कपोल होने पर मजबूर है जो लेाकतंत्र के लिये सबसे बड़ा सवाल है। 

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