सेवा के नाम, सतत सत्ता सुख, क्या आइडिया है.........तीरंदाज ?

भैया- मने तो बोल्यू हाथों हाथ पीएमओं पोर्टल या फिर सीएम के आइडिया पोर्टल पर अपना आइडिया डाला आ स्टार्टप के दौर में तने भी सत्ता का उघोग लगा। यूं तो स्टार्टप में तीन वर्ष की टेक्स छूट है। मगर सतत सत्ता उघोग में तो जिन्दगी भर माल की लूट है। ऐसे में थारा उघोग भी जनसेवा के नाम चमक जायेगा। ज्यादा नहीं तो फिलहाल 5 वर्ष का पैटेन्ट जनसेवा के नाम सत्ता सुख भोगने का मिल जायेगा। बैसे भी भाई लेाग विगत 12 वर्षो से भक्त, सेवक बन भगवान के हिस्से की मलाई फांक रहे है। बैचारे भगवान इन भक्तों की भक्ती के चलते या तो इधर उधर भटक भड़-भड़वा रहे है, या फिर प्राकृतिक आपदा से आहत सीधे फांसी पर झूल रहे है। 


भैये- तने भी स्टार्टव की शुभ बेला और मुद्रा बैंक के ला ा से इतर क्या अर्र-बर्र बक रहा है। कै थारे को भगवान, भक्त के बीच का वह प्रेम नहीं दिख रहा, जिसके चलते तीसरी मर्तवा म.प्र. के महान भक्त म.प्र. के भगवानों की सेवा में दोनों हाथों से जुटे है। भगवान को तकलीफ न हो, इसलिये चौथी मर्तवा प्रदेश सेवा की तैयारी कर रहे है। 
भैया- मने जानू यहीं तो कैडर आड़ों का हाइटेक आइडिया है। दि ााने को मैदान संगठन मगर सारा भार शासकीय सिपहसालारों पर चल रहा है। रैली हो या रैला, पंचायत हो या फिर महापंचायत सभी में तो सेवा के नाम शासकीय अमले का होम हो रहा है और प्रदेश के भगवानों को खुश करने अश्वमेघ यज्ञ से पहले छोटे-मोटे यज्ञों का दौर चल रहा है। जिसमें यज्ञ भूमि भी भगवान की ओर होम का सामान भी भगवान का, सो भाया मने तो बोल्यू हारे म.प्र. में भक्तों की विगत 12 वर्षो से चकाचक चल रही है। और 2018 के रिन्यूबल की तैयारी हो रही है। क्योंकि विरोधी भक्तों के नाम मैदान साफ पढ़ा है। अगर यो कहें कि स्वयं स्वार्थ में डूबा समुचा विपक्ष अचेत पड़ा है। 
भैये- चुप कर कहीं व्यापम तो कहीं मनरेगा की भ्रष्टाचार में रंगी फेरिस्त पड़ी है। जरा भोपुओं के सुर तो बदलने दे। भैये किस-किस को मुंह बन्द रखने के नाम, कितना माल बटा है, उसकी रिट इन्दौर कोर्ट मेंं लग चुकी है। 
भैया- तो क्या केडर आड़ों के दल में भी जनता के दल का घाल मेल मचा है आखिर ये तो बता कौने कौन भ्रष्टाचार के दल-दल में फसा है। 
भैये- सॉसल मीडिया में भोपुओं के चुप रहते, खासा कोहराम मचा है किस भोपू को मुंह बन्द रखने का कैसे-कैसे कितना मिला लिस्ट में सब कुछ लिखा है। फिर त्रिस्तरीय राज वालो का दर्द भी किससे छिपा है, जो परिपत्रों के सहारे अधिकारों के नाम औंदे मुंह पढ़ा है। 
भैया- मने समझ लिया थारी बात लगता है कैडर आड़ों से बेहतर आयडिया सतत सत्ता में बने रहने का और किसी के पास नहीं, जिसमें रंग लगे न फिटकरी और रंग चौखा आये, मने तो बोल्यू कास मने भी यह गुण सीख लिया होता तो और बसुदैव कुटु बकम की भावना से भ्रष्टाचार कर चुनाव लड़ लिया होता तो मुये स्वार्थी तो औंधे मुंह दिखते ही और जनसेवा के नाम सत्ता भोगने वाले भक्त भी आज सत्ता से बाहर पढ़े होते।  बोल भैये कैसी रही। 

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