गांधी का रास्ता ही, सटीक रास्ता दिखा सकता है, राहुल गांधी को

व्ही.एस.भुल्ले/ विलेज टाइम्स, म.प्र. ग्वालियर, फरवरी 2016- कभी यूपीए सरकार की नीतियों से असहमत हों, सरकार के विरुद्ध ही मुखर होना, तो कभी एनडीए सरकार की नीतियों से मुखर हो सदन से लेकर सड़क तक कोहराम मचाने वाले कॉग्रेस के युवा तुर्क राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी कुछ महीनों से लगता है कि अब वह गांधी के रास्ते चल एक नई राजनीति का देश में सूत्र पात करना चाहते है। जिस तरह से वह मन्दिर, महा विद्यालय, विश्व विद्यालयों की चौकट तक पहुंच धरना, प्रदर्शन में भाग ले रहे है।
उससे लगता है कि अब उन्हें धीरे-धीरे भारतीय राजनीति का मर्म समझ आने लगा है। हाालिया उनके क्रान्तिकारी व्यान की कॉग्रेस इन्टरनेट आजादी की समर्थक है। इस बात का धोतक है कि किसी भी सरकार की नीति का बगैर सोचे समझे विरोध उचित नहीं। चूकि राहुल गांधी विपक्षी दल के मुखिया स्वरुप विरोध के हकदार है और उन्हें ऐसी नीतियों का का विरोध निरन्तर जारी रखना चाहिए। जिसमें गांव-गरीब का हित न हो। मगर विरोध स्वरुप विरोध तो होना ही चाहिए  मगर उसमें सकारात्मक पक्ष भी र ाना चाहिए।
मगर दुर्भाग्य कि जिस मेहनत के साथ वह विरोधियों की आलोचनाओं से इतर देश भर में घूूम-घूम कर नीति गत मुद्दों की खातिर देश के लिये जो लड़ाई लड़ रहे है, वह उस लड़ाई में उनके सिपहसालार पूरी द्रणता से उनके साथ दिखाई नहीं दे रहे है। जिसका कारण कि उनके संगठन के सिपहसालार और उनमें पूरी एक पीढ़ी का अन्तर जो है। जो युवा पीढ़ी उनके साथ कदम ताल करती दिखाई देती है, वह भी पूर्ण आत्म विश्वास से ओझल दिखाई पड़ती है। 
कारण साफ है जब तक राहुल एक राजनैतिक योद्धा की भांति अपने भ्रमण के दौरान या फिर पठन पाठन के दौरान उनके माफिक उन गुरेल्ले योद्धाओं की पहचान करने में कामयाब नहीं होगें, तब तक उनका कारवां वहीं सड़ी-गली सेना में मौजूद चापलूस, चाटूकारों मुक्त नहीं हो सकता। 
देश में आज भी सेकड़ों हजारों कॉग्रेस विचार धारा के समर्थक कॉग्रेस को एक नये रुप में दे ाने उतावले है जो अपने-अपने तरह से अपने-अपने संगठनों संस्थाओं के माध्यम से एक खुशहाल सशक्त भारत निर्माण का सपना सजा संघर्ष में जुटे है। मगर एक स्वाभिमानी नीति और स मान जनक देश सेवा के लिये वह चाहते है कि किसी भी दल में चापलूस, चाटूकार कितने भी हो मगर वे किसी भी स्थिति में दल की विचार धारा और नेतृत्व के व्यवहार पर हावी न हो। शायद यहीं वह कड़ी है जिस पर राहुल गांधी को तीव्र गति से विचार ही नहीं काम करना आवश्यक है। अगर वाक्य में ही वह अपने पूर्वजों की भांति देश और देश के महान संगठन कॉग्रेस के लिये कुछ करना चाहते है तो उन्हें साहित्य, संवाद, समाचार जगत से सीधा जुड़ इसी प्रकार अपने भ्रमण और विचारों से लेागों को जोडऩा होगा तभी एक क्रान्ति के रुप में कॉग्रेस का कारवां खड़ा हो सकेगा। क्योंकि यह कटु सत्य है कि हर सिपहसालार अपने सिद्धान्त और सेनापति के लिये लड़ता है यहां तक कि जरुरत पढऩे पर अपनी जान भी नौछावर कर देता है। मगर ऐसे सिपहसालारों से सेनापति का स पर्क, संवाद जीवंत होना अतिआवश्यक है। यहीं खूबी महात्मा गांधी की भी थी, कि उनका, उनके आभामण्डल उनके सहयोगी, शुभचिन्तकों से उनका सीधा स पर्क और संवाद था। वह स्वयं के स्वाभिमान के साथ राष्ट्र के या विचार के मान-स मान के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। फिर चाहें वह उनके सेवक, संगी साथी या शुभचिन्तक हो। वह सतत स पर्क, संवाद एवं सूचनाओं से परिपूर्ण रहते थे। 
काश राहुल गांधी अगर अपना यह पक्ष भी मजबूत कर पाये तो निश्चित ही उनका कारवां एक ल बे मार्ग को तय करने में कामयाब हो पायेगा। क्योंकि 2 वर्ष बेकार के बीत जाने के बाद अब मात्र 2 वर्ष का ही समय शेष है जिसमें भावी कुछ राज्यों के चुनावों में 1 वर्ष भी शेष नहीं। सोचना स्वयं राहुल गांधी को है। 
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