जबावदेही के आभाव में खुशहाली असंभव

विलेज टाइम्स, जनवरी 2016। देश में विकास या फिर तीव्र विकास के कितने ही खाके हम क्यूं न खींच ले, मगर बगैर जबावदेही के खुशहाली असभव है। ये अलग बात है कि पूर्ववर्ती सरकारों के विकास का मेफ मांग आपूर्ति आधारित था और इसी रास्ते राजनैतिक दलों को सत्ता में बने रहने या सत्ता तक पहुंचने का सुगम रास्ता बनाना होता था। 


जिसमेें निश्चित मात्रा में अधोरसरंचना निर्माण व योजनाओं के माध्यम से आधा अधूरा दीन-हीन गरीबों के प्रति सहायता का भाव छुपा होता था मगर जबावदेही का आभाव तब भी था और आज भी है। मगर मात्र 2 वर्ष से कम के समय में रोजगार, विकास, सेवा, सुविधा, सुरक्षा का जो खाका खींचा गया है वह सीधा और तत्कालिक लाभ के साथ दूरगामी परिणाम देने वाला भी है। 

चाहे फिर वह सुरक्षा का मसला हो या फिर उत्पादन से लेकर रोजगार और प्रशिक्षण से जुड़ा हो, जिसमें स्मार्ट सिटी, ग्रीन इण्डिया, प्रधानमंत्री कृषि, सिंचाई, डिजीटल, स्केल इण्डिया हो या फिर प्रधानमंत्री जनधन बीमा, अटल पेन्शन, स्र्टाटप सहित सूक्ष्म, लघु उघोग क्ष्ेात्र के विकास का मामला हो, फिलहाल देश की वन मैन आर्मी का प्रदर्शन खाका खीचने के मामले में देश के अन्दर ही नहीं देश के बाहर भी बेहतर चल रहा है। 

मगर इसके उलट अन्तराष्ट्रीय मुद्रा बचाने व देश की नस्ल को स्वस्थ बनाने वाला क्षेत्र अभी भी छूटा पढ़ा है। अगर देश की वन मेन आर्मी मानव शक्ति को सही दिशा दिखा, देश के विकास में, उसका बेहतर उपयोग, देश के अन्दर करने में सफल रही तो यह भारत जैसे महान देश में खुशहाली और जबावदेही सुनिश्चित कर राष्ट्र सेवा में सबसे अहम कदम होगा। 

कारण साफ है कि जिसकी हमें व्यवहारिक जीवन और देश में स त जरुरत उसके मोहताज बने है, मैंने आज ही एक प्रतिष्ठित अखबार पत्रिका में पढ़ा कि एस्पाइरिंग मांइड संस्था की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 1.5 लाख इन्जीनियरों के सर्वे में 80 फीसदी से ज्यादा इन्जीनियर, रोजगार के लिये अकुशल पाये गये। इससे पूर्व भी पियून भृत्यु के पद पर हजारों ग्रेज्यूट, पोस्ट ग्रेज्यूट, इन्जीनियरों द्वारा नौकरी पाने आवदेन किये गये। 

यह हमारी गैरजि मेदार शिक्षा और मौजूद व्यवस्था का कड़वा सच है बड़े पैमाने पर प्रकृति से होती छेड़ छाड़ का नंगा सच यह है कि प्रकृति में अमूल चूल परिवर्तन आना शुरु हो चुके है। मगर जबावदेह लोग आज भी चुप है हालात यह है कि प्राकृतिक प्रकोप की बली हर वर्ष हमारे अन्न दाता चढ़ रहे है। मगर जि मेदार जबावदेही से बचने बे सर पैर की येाजनाओं को गढ़ रहे है। क्योंकि न तो समय पर सटीक मूल्याकंन है न ही किसी की कोई जबावदेही फिक्स। 

इससे बड़ा उदाहरण हमारे देश में और क्या हो सकता है कि जिस टॉक्सीन इन्जेक्शन की बिक्री  पर भारत सरकार ने रोक लगा रखी है। वह म.प्र. में धड़ल्ले से दूध व्यवसायी पशु पालको को बिच रहा है। जिसके दुधारु पशु पर उपयोग से दुधारु पशु तो तडफ़-तडफ़ कर मर ही रहे है साथ यह दूध इन्सानों की मौजूद व आने वाली पीढ़ी के जीवन को भी नष्ट कर मांसाहारी पशु-पक्षियों को खतरा बन गये है परिणाम कि टॉक्सीन युक्त मरे पुश का मास खा गिद्ध कौओं की नस्ल विलुप्ती के कागार पर जा पहुंची है। 

निश्चित ही अत्यअधिक जबावदेही किसी भी संघीय ढांचा गत व्यवस्था में राज्य सरकारों की होती है। अगर देश की बाह आन्तरिेक सुरक्षा से लेकर आम गरीब मजदूर की आर्थिक सुरक्षा कौशल विकास, सूक्ष्म, लघु उघोग सहित छोटे-मोटे व्यवसाय स्थापित करने स्टार्टप के माध्यम से सूक्ष्म, लघु मध्यम बड़ी क पनियाँ बना नौकर ही नहीं मालिक बनाने वहीं ग्रीन इण्डिया, प्रधानमंत्री  सिंचाई, डिजीटल इण्डिया के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई रोजगार मालिकाना हक की शुरुआत अगर केन्द्र सरकार कर सकती है वह भी मात्र दो वर्ष से कम समय में तो राज्य सरकारें, शिक्षा, सुरक्षा कौशल विकास में अपनी अहम भूमिका क्यों नहीं निभा सकती। क्यों राज्य सरकारे बैंको में विभिन्न योजनाओं मदो में पढ़ी करोड़ों, अरबों की तरल राशि तथा राज्यों में मौजूद गौण खनिज स्थाई एसिटस का उपयोग कर संसाधन जुटा पा रही है, यह हमारे लिये खेद ही नहीं लेाकतांत्रिक व्यवस्था में अफसेास का विषय होना चाहिए। 

केन्द्र सरकार द्वारा विगत 2 वर्ष से कम समय में लागू योजनायें उन राज्य सरकारों को उदाहरण है जो विगत 12-12 वर्षो से या 3-4 वर्षो से सत्ता में है राज्य सरकारों को सीखना चाहिए देश की उस वन मेन आर्मी से और देश के एक सच्चे जन सेवक से जो देश व देश खुशहाली ही नहीं राष्ट्र के मान स मान की खातिर अपने मान-स मान की परवाह किये बगैर, लाख आलोचनाओं के बावजूद मात्र 2 वर्ष के अन्दर एक खाका खींचने में तो सफल रहा, अब देखना यह होगा कि गैर जबावदेह व्यवस्था में कितनी जबावदेही के साथ काम शुरु हो पाता है। 

फिलहाल तो शौच मुक्त, शौचालय युक्त गांव-शहर बनाये जाने का क्रम स्वच्छता अभियान के तहत देश भर में युद्ध स्तर पर जारी है। और स्वच्छता अभियान को लेकर देश वासियों के जहन में कई सवाल भी है। देखना होगा क्या आने वाले समय में कत्र्तव्य अधिकारों की जंग में जबावदेही कब फिक्स हो पाती है।  

पूर्व सैनिक परिवार पेंशन के लिये सैन्य दस्तावेज में दर्ज करवायें पत्नी का नाम
भोपाल : गुरूवार, जनवरी २८, २०१६,
पूर्व सैनिक परिवार पेंशन के लिये पत्नी का नाम सैन्य दस्तावेज में दर्ज करवा सकते हैं। साथ ही पूर्व सैनिक एवं उनकी विधवाएँ ईसीएचएस सदस्यता ग्रहण करने के लिये स्टेशन हेड क्वार्टर भोपाल में आवेदन दे सकती हैं। ईसीएचएस हेल्प-लाइन नम्बर ०७५५-२७३१०५७ है। एमएच सुविधा से संबंधित जानकारी हेल्प-लाइन नम्बर ०७५५-२६४२०२० से भी प्राप्त की जा सकती है। डिजिटल लाइफ पंजीयन के लिये पीपीओ, आधार-कार्ड, बैंक पास-बुक और डिस्चार्ज-बुक के साथ पंजीयन करवाया जा सकता है। पता एवं मोबाइल नम्बर परिवर्तन की सूचना जिला सैनिक कल्याण कार्यालय में मोबाइल नम्बर ९६१७३३४६८६ और दूरभाष क्रमांक ०७५५-२५५६१९८ पर दी जा सकती है। सैनिकों से केन्द्र और राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिये आधार-कार्ड बनवाने की अपील भी की गयी है। विवाह पंजीयन, बच्चों के जन्म और गोद लेने के संबंध में अब प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के स्थान पर नोटरी द्वारा हस्ताक्षरित शपथ-पत्र ही मान्य होगा। कल्याण संबंधी जानकारी विभाग की वेबसाइट 222.ह्म्ह्यड्ढद्वश्च.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ पर उपलब्ध है। शिकायत और समस्या के निराकरण के लिये दूरभाष क्रमांक ०७५५-२५५६१९८ और ४२५३०२३ पर सम्पर्क किया जा सकता है।

प्रदेश के ३२ शहरों को दिसम्बर तक खुले में शौच मुक्त करने का लक्ष्य
रायपुर, २८ जनवरी २०१६ राज्य शासन ने प्रदेश के ३२ शहरों को दिसम्बर २०१६ तक खुले में शौच मुक्त और ४ शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के शत प्रतिशत क्रियान्वयन करने का लक्ष्य रखा है .नगरीय प्रशासन और विकास विभाग के प्रमुख सचिव ने बताया कि केंद्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय द्वारा प्रदेश के ३ नगर निगमों, पांच  नगर पालिका  परिषदों और  २४ नगर पंचायतों को दिसम्बर २०१६ तक खुले में शौच मुक्त और चार नगरीय निकायों अंबिकापुर ,धमतरी ,अकलतरा और माना कैम्प को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के शत प्रतिशत क्रियान्वयन के लिए चुना गया है .विभाग से मिली जानकारी के अनुसार  मिशन प्रारंभ होने से अब तक ६०  हजार  ५०५ निजी पक्के शौचालयों का निर्माण हो चुका है और ४०  हजार ६१५ शौचालयों का निर्माण प्रगति  पर है .
   उल्लेखनीय है कि  दिसम्बर २०१६ तक खुले में शौच मुक्त करने के लिए चयनित ३ नगर निगमों में धमतरी ,अंबिकापुर और बीरगांव , पांच  नगर पालिका  परिषदों में अकलतरा,बलोदाबाजार ,बलरामपुर ,दीपिका ,खरसिया और  २४ नगर पंचायतों में माना कैम्प ,धमधा ,पाटन ,गुरुर,चिखलाकसा, बोड़्ला ,अम्बागढ़ चौकी ,बलौदा ,खरोरा ,छुरा ,बिलाईगढ़ , कुरूद ,घरघोड़ा ,किरोड़ीमल नगर ,बरमकेला, लखनपुर ,सीतापुर ,राजपुर ,विश्रामपुर ,जरही, भटगांव ,भानुप्रतापपुर , नरहरपुर ,और कोंटा  शामिल हैं . इन ३२ नगरीय निकायों को दिसम्बर २०१६ तक खुले में शौच मुक्त और चार नगरीय निकायों अंबिकापुर ,धमतरी ,अकलतरा और माना कैम्प को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के शत प्रतिशत क्रियान्वयन के लिए चुना गया है .
    नगरीय प्रशासन और विकास विभाग द्वारा उपरोक्त सभी नगरीय निकायों को जारी परिपत्र में निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने अपने क्षेत्रों में निजी शौचालय निर्माण का लक्ष्य सौ फीसदी पूर्ण करें .. अपवाद की स्थिति में यदि चिन्हांकित घरों में निजी शौचालय के लिए स्थान उपलब्ध न हो या हितग्राही का मकान जल स्रोत जैसे नदी,तालाब,कुआँ ,हैण्ड पम्प आदि के नजदीक हो जिससे जल स्रोतों के प्रभावित होने की सम्भावना हो तो ऐसे क्षेत्रों में सुविधा २४ योजना के तहत सामुदायिक शौचालय का निर्माण करवाया जाये .इस योजना के लिए सम्बंधित जिले के कलेक्टर सक्षम अधिकारी होंगे .
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