भोजन को मोहताज गिद्ध, जहर गटकने मजबूर

विलुप्ति की ओर बढ़ते गिद्धों की गिनती का कार्य भले ही शुरु हो गया हो मगर सच यह है कि शुद्ध भोजन के आभाव में पक्षियों की प्रजाति जहरीला मां...

विलुप्ति की ओर बढ़ते गिद्धों की गिनती का कार्य भले ही शुरु हो गया हो मगर सच यह है कि शुद्ध भोजन के आभाव में पक्षियों की प्रजाति जहरीला मांस खाते खाते विलुप्ति के कगार पर जा पहुंची जिसको लेकर वन महकमा अब जागा है कहते है देर आये दुरुस्त आये। 


मगर कहते है व्यवस्था कत्र्तव्य विमुख और समाज अनुशासन विहीन हो जाये तो बदलाब आते ही है फिर वह बदलाब भौतिक हो या फिर प्राकृतिक, ऐसा ही कुछ धन लालचियाों की अकूत दौलत बनाने की इच्छा के चलते चल रहा है। मगर कत्र्तव्य विमुख लेाग आज भी अन्धें हो, मानव जाति ही नहीं, पशु, पक्षियों तक जीवन तिल-तिल मर तबाह होने से नहीं बचा पा रहे। 

अगर म.प्र. शासन चाहे तो घन्टे भर में प्रदेश के अन्दर बिचते इस मंद खतरनाक जहर से बर्बाद होती मानव पीढ़ी व पशु-पक्षियों को भी भयानक मौत देने वाले इस जहर से बचाया जा सकता है। चन्द रुपयों की खातिर मौत बेचने वाले इन मौत के सौदागरों और कत्र्तव्य विमुख उन जि मेदार लेागों को यह समझ नहीं आ रहा कि इस मंद जहर का शिकार पशु-पक्षी ही नहीं मानव जाति भी हो रही है। जिससे पीढिय़ा तक खराब हो रही है और जो लोग दूध और मांस के रुप में अन्जाने में उपयोग कर रहे है, इसके चलते यह खतरनाक मंद जहर लेागों के शरीर तक पहुंच रहा है हर मां-बाप चाहता कि उसका बच्चा दूध पीकर तन्दुरुस्त बने और पेट की आग बुझाने मांस खाने वाले लेाग भी इसकी चपेट में आते है। 

टॉक्सीन इन्जेक्शन के रुप में प्रचलित इस जहर का इस्तमाल दूध उत्पादक दूध अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिये करते है जो सरेयाम मेडीकल स्टोर्स एवं खर विके्रताओं  के यहां बेचा जाता है। 

जिसके उत्पादन, बिक्री पर भारत सरकार ने रोक भी लगा रखी है। मगर भी मेडीकल स्टोर्स, खर विक्रेताओं पर यह इन्जेक्शन कहा से आ रहा है। यह शासन सरकारों के लिये सोच का विषय है। अगर सरकार शासन एक साथ प्रदेश के सभी दबा विक्रेता, खर विक्रेताओं के यहां छापेमारी करे तो प्रदेश भर से इस मंद जहर का बड़ा खुलासा हो सकता है। 
बहरहाल जिस तरह से बच्चों के बॉडी फिगर में अप्रत्याशित बदलाव लेागों में ग भीर बीमारी और मांसाहारी पक्षियों की जाति मौत से वह विलुप्ति की ओर बढ़ रही है। 
उसका सबसे बड़ा कारण दुधारु पशुओं पर टॉक्सीन इन्जेक्शन के उपयोग ही सबसे बड़ा कारण है। 

रहा सवाल गिद्ध प्रजाति का तो उनका धर्म संकट यह है कि जंगलों में अचानक शिकारी जानवरों की सं या में कमी और पशु पालकों में पैसे की खातिर अनुउपयोगी पशुओं को मांस विक्रेताओं को बेचने की प्रवृति के चलते अब उन्हें जंगल में शुद्ध भोजन मिलना मुश्किल हो गया है,जिन पशुओं की स्वत: मौत से उन्हें अब जो भोजन मिल रहा है वह टॉक्सीन युक्त जहरीला होता है। 

इसलिये गिद्ध ही नहीं मासाहारी पक्षी या तो भोजन के आभाव में मर रहे या फिर विषाक्त मांस खाने से। 
बेहतर हो कि सरकारें व शासन अपनी कत्र्तव्य निष्ठा मानव, पशु-पक्षियों के प्रति दिखा। टॉक्सीन को जड़ मूल से खत्म करने का बीढ़ा उठाये तभी गिद्ध, कौआ या अन्य पक्षी और खोखली होती मानव जाती को बचाआ जा सकता है। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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भोजन को मोहताज गिद्ध, जहर गटकने मजबूर
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