खुशहाल भारत निर्माण में शिक्षा, सुरक्षा, संसाधनों का भाव अहम- संयोजक स्वराज

धमैन्द्र गुर्जर/म.प्र. जनवरी 2016. आजादी से लेकर आज तक और अभी तक न जाने कितनी ही योजनायें बनी और आज भी बन रही है। मगर गरीब की खुशहालहाली आज भी गली, मोहल्लों गांव से नदारद है। हम ऐसा भी नहीं मानते कि आजादी से लेकर आज तक देश की खुशहाली के लिये कार्य नहीं हुआ बल्कि कई लेागों ने कड़ी मेहनत कर देश के आम गरीब, गांव, मोहल्लों की खुशहाली के लिये कार्य किया और खुशहाल देश की खातिर कई कुर्बानियों भी हुई मगर खुशहाली नहीं लौट सकी। 


उक्त बात स्वराज के संयोजक भाई वीरेन्द्र जी ने अनौपचारिक चर्चा के दौरान कही। वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुये उन्होंने कहा कि देश में वर्तमान स्थिति के लिये सबसे अहम कारण देश में शिक्षा, सुरक्षा, संसाधनों के भाव का अभाव रहा है, बरना क्या कारण है कि प्राकृतिक स पदा से स पन्न, मानव ऊर्जा से स पन्न राष्ट्र के कुछ प्रदेशों में 60-70 फीसदी बच्चों को ठीक से भोजन नसीब नहीं लगभग 40-60 फीसद बच्चे कुपोषण का शिकार है। शिक्षा की हालत ऐसी कि उसको पढ़के केवल नौकर ही निकल सकते है। चाहे वह चपरासी, बाबू, मास्टर हों या मार्केटिंग से जुड़े सेलर मगर देश के नौजवान को मालिक बनाने का भाव ही हमारी शिक्षा, संस्कृति से गायब रहा है। हमारा दुर्भाग्य यह रहा कि  खुशहाल देश के लिये, वोटो की राजनीति के आगे कोई भी सरकार एक राष्ट्रीय, रोजगार उन्नमुख शिक्षा नीति देने की खातिर सत्ता की कुर्बानी देने तैयार नहीं हुई जिसका परिणाम कि हम आज भी कचरा नीति ढोने के लिये हम मजबूर है। 

ऐसा ही हाल बैडोल हथियार के नाम ल_ सी बन्दूके स हाले उन अनक फर्ड ड्रेसो में तैनात हमारी सुरक्षा संसाधन का है। जो आम नागरिक के अन्दर आज भी सुरक्षा का भाव पैदा नहीं कर सके, जो कुछ थोड़ा बहुत रुतवा पुलिस का सुरक्षा के नाम हुआ करता था वह भी वोटो की राजनीति और पुलिस में राजनेताओं के स्वार्थ अनुरुप अनावश्यक हस्तक्षेप के चलते जाता रहा। 

रहा सवाल देश में नये संसाधनो का तो नये संसाधन तो दूर की कोणी, देश की प्रकृति में मौजूद संसाधनों के हालात भी कुछ ऐसे है उन पर सरकारी नीतियों की अनावश्यक बन्दिस, लकीर के फकीर बन मोटा वेतन जनता के टेक्स से कबाडऩे वालो ने कानून की आड़ में अलग से जागीरे बना रखी है। जिसमें देश का आम भोला-भाला गरीब फटक तक नहीं सकता। देश के अन्दर कानून के नाम पर बैवजह की ऐसी बन्दिसे कि जनकल्याण की योजनाओं को मूर्त रुप देने में चुने हुये जनप्रतिनिधि और सरकारों तक को खुद ही पसीने छूटने लगे तो एक गांव तो गांव गली के आम गरीब की क्या विसात जो जीवोत्पार्जन के लिये प्राकृतिक ढंग से दोहन कर पाये। आज भी जल, जंगल, जमीन और उत्पादन को भगवान मान पूजने वाले गांव, गरीब स्पष्ट पारदर्शी नीति के अभाव में अपने आस्था के भगवान जल, जंगल और जमीन की पूजा को मोहताज है। 

यह हमारे देश के सामने खुशहाल भारत निर्माण के लिये वह यक्ष प्रश्र है जिनका जबाव मौजूद सरकारों को देना चाहिए। 

देश के कई प्रदेशों में सत्ता चला रहे या चला चुके लेागों को देश के आम गरीब,किसान को गली मोहल्ले गांवों में जाकर बताना चाहिए। कि देश की सबा अरब आबादी की शक्ति, संसाधन सब आपके पास है यहां तक कि गलती से भी आम नागरिक से कोई अपराध हो जाये, सजा देने तक के अधिकार आपके पास है। फिर देश की राष्ट्रीय रोजगार उन्मुख शिक्षा नीति के निर्माण मे आपकी क्या मजबूरी है ? क्यों हमारी पुलिस अपराधियों में अपनी ताकत का ऐहसास नहीं करा पाती, कैसे जघन्य अपराधी देखते-देखते कई अपराध उन पर होने के बावजूद भी जमानत पर रिहा हो, अपनी दशहत का नंगा नाच गांव, गली मोहल्ले ही नहीं बीच चौराहों पर करते है। 

कौन से ऐसे कानून है जो लेागों में असुरक्षा व प्रकृति प्रदत्त संसाधनो का प्राकृतिक ढंग से दोहन करने से रोकते है। 

क्यों आप लेाग आज तक जल, जंगल, जमीन की स्पष्ट पारदर्शी नीति नहीं बना पाये। अगर कोई नीति बनी भी तो आम गांव, गरीब के दिल में वो एहसास क्यों पैदा नहीं कर पाये, कि वह स्वयं के सर्वागींण विकास के लिये शिक्षित और सुरक्षित है। देश में सहज संसाधनों का आभाव नहीं ? हो सकता है शायद ही मौजूदा या पूर्व सरकारें इस अहम मसले पर देश वासियों कोई जबाव दे, क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो अपने-अपने तरीके से देश को खुशहाल बना जन सेवा, राष्ट्र सेवा के नाम सतत सत्ता में बने रहना हो सकता है। सच क्या है, यह देश के सामने है। 
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