शिवपुरी का सीवर, सिन्ध प्रोजक्ट सुविधा है, या जघन्य सजा

म.प्र. शिवपुरी- शिवपुरी के लिये सजा या सुविधा है, प्रचलित सिन्ध और सीवर प्रोजक्ट, चर्चा तो यहां तक है। कि इतनी जघन्य सेवा, सुविधा की कीमत शायद ही देश के किसी कोने मेंं चुकाई जा रही हो, जिसने समुची मानवता को ही शर्मसार कर दिया हो, 21वी सदी में ऐसा लेामहर्षक हाल उस शहर का है जिसे कभी सिंधिया स्टेट की ग्रीष्म कालीन राजधानी और ग्वालियर च बल ही नहीं समुचे म.प्र. का स्वर्ग कहा जाता था।
यहां का जल पर्यावरण इतना शुद्ध होता था सड़के ऐसी कि लोग इस शहर को देख वाह कहने से नहीं चूकते थे। कभी इस शहर के प्रति लेागों में ऐसी चाहा कि क्या अधिकारी, कर्मचारी,व्यापारी तब और अब नौकरी के मामले में स्वर्ग मानते थे। जो आया, वह गया ही नहीं, कुछ तो इस शिवपुरी के होकर रह गये।

मगर सीवर, सिन्ध के नाम म.प्र. की राजनीति का शिवपुरी में ऐसा अखाड़ा बना कि लेाग भले ही पुराने युद्धों की तरह नहीं  मर रहे हो, मगर बड़ी ही बेरहमी से मरने के मुहाने तक लेाग अवश्य पहुंच रहे है। पहले अशुद्ध पेयजल के चलते पेट की बीमारियों से लेाग ग्रस्त थे अब तो हवा ही जान की दुश्मन बन चुकी है। जिसमें प्रदूषण का पैमाना 300 के पार है, जो किसी भी इन्सान के फेफड़ों को खत्म करने काफी है। 

मगर यहां तो भाई लेाग माननीय न्यायालय की गाइड लाइन को भी अनदेखा कर रहे है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि जनसुविधा की कीमत पर ऐसा कोई निर्माण नहीं किया जा सकता जिसमें असुविधा हो, मगर यहां तो जान पर आन पढ़ी है। 

सिन्ध पेयजल के लिये वर्षो से भटकते लोग फिर भी जीवन व्यतीत कर रहे थेे, मगर सीवर प्रोजक्ट के चलते शहर में बढ़ते प्रदूषण के चलते जो तिल-तिल मरने पर लेाग मजबूर हो रहे है, यह बड़ा ही वीभत्स है। 

आखिर ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है यह सवाल आज भी शिवपुरी वासियों के सामने खड़ा है। और लेाग इसका उत्तर भी चाहते है। अगर देश भर के कई विकास के उदाहरण देेखे तो गहरी खुदाई के वक्त निर्माण ऐजेन्सी, खुदाई क्षेत्र को टीनशेड से कवर्ड कर खुदाई कर कार्य करती है। और एक दिशा से दूसरी दिशा की ओर बढ़ती है, काम पूरा होने पर उस स्थान अगर सड़क है तो चलने योग्य मोटरेवल बनाती है या फिर मर मत कर उसे सही कराती है, जैसा भी प्रोजक्ट में उल्लेख हो, इसके अलावा कार्य के दौरान अगर व्यस्थतम रोड है, तो लेागों को आने जाने, वैकल्पिक रोड बनाई जाती है। यह देश का कानून है मगर दुर्भाग्य कि सीवर प्रोजक्ट के दौरान ऐसा कुछ भी नहीं हो सका। लेाग इस बीच अपाहित घायल होते रहे। बगैर किसी कार्य योजना के मनमाने ढंग से खोदा गया शहर बगैर किसी परिणाम के फिलहाल खोदा जा रहा है चहुंओर खुदे इस शहर का आलाम यह है कि वह आज यह शहर धूल के ढेर में तब्दील हो चुका है। हालत यह है कि 3बाई3 कि.मी. रेडियस मे बसे इस शहर में लेाग न तो सुबह, दोपहर उड़ती खतरनाक धूल सेे सुरक्षित है न ही रात को घरों के अन्दर, मगर वैशर्म सरकार और विपक्ष का दम भरने वाले लेागों को शर्म कहां, न ही वह नौकरशाह जो दिन रात भ्रष्टाचार में लिप्त गुल छर्रे उड़ाने में मस्त है। मगर अफसोस कि लोग बोल नहीं रहे।

अब इसे यह शहर अपनी नियत या अपराध समझे या इसे स्वर्ग, मगर मानवता के लिये तो इसे नरक ही कहा जायेगा इसके लिये फिलहाल दोषी जो भी हो। मगर राजधर्म यह स्वीकार नहीं करता सरकार जिसकी भी हो।  
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