नादिरशाही का गढ़ बनता शहर, तमाशबीन की मुद्रा में शासन

व्ही.एस.भुल्ले। विलेज टाइम्स, जनवरी 2016 म.प्र. शिवपुरी- दाद देनी होगी इस दरिया दिल शहर को जो 2 वर्ष से उड़ते लाल धूल के गुबार में खासता बच्चा बूढ़ा जबान, बैवस मायूस हो आज चुप है। क्योंकि तमाशबीन शासन के सामने चहुंओर पसरी अलाली, अराजकता और सन्नाटा इस बात का गवाह है कि संकट फिलहाल टलने वाला नहीं और लेाग दु:खी है जुमलों में लेाग यह कहते नहीं थकते कि जब तक ये योजनायें पूर्ण होंगी तब तक न जाने कितनों पर और मखाने फिक जायेंगें। 

लगता है टेबिलो पर बैठ वाला, वाला बनी, सीवर सिन्ध जलावर्धन की डी.पी.आर. इस तरह से तैयार की गई जिसका मानों शहर से कोई सरोकार ही न हो, इन कार्यो को पूर्ण कराने वाली एजेन्सियां ऐसी मिली जिन पर जि मेदारियों का मानो एहसास ही न हो।
बगैर व्यवस्थित कार्य योजना के शुरु हुये इन विकास कार्यो ने म.प्र. के सबसे सुन्दर शहर को लाल मिट्टी के ढेर में तब्दील कर दिया। 
आज से सौं वर्ष पूर्व अंग्रेजेा की छावनी को अपने राज्य की समर कैपीटल बनाने वाले सिंधिया वंश के लेाकप्रिय शासक कै.माधौ राव जयाजी राव सिंधिया जिन्होंने कई मर्तवा स्वयं राख से लाइन खींच इसको सुव्यस्थित, सुन्दर, सुविधा युक्त शहर बनाने ले आहट दिया हो, वह शहर मात्र 100 वर्ष में इतना बर्बाद हो धूल के ढेर में तब्दील हो जायेगा किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। 
अगर सूत्रों की माने तो सिंधिया स्टेट की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रुप में विकसित इस शहर के विनाश की शुरुआत तब हुई जब आजादी के बाद इसे आजाद भारत में मर्ज कर लिया गया। और नगर पालिका के अधीन शहर चला गया। 
शहर की सुन्दरता पर पहला कहर तब टूटा जब शहर के 100 वर्ष पुराने खेल मैदान पोलो ग्राउन्ड के आधे भाग में जिला चिकित्सालय का निर्माण कर दिया गया। 
और सिंधिया स्टेट का सचिवालय वर्तमान कलेक्ट्रेट भवन, महल, सांस्कृतिक भवन (मयूर टॉकीज) क्लब के बीचों बीच अस्पताल बन गया। 
उसके बाद राजनैतिक रसूख व अधिकारियों के चहेतों ने शासकीय भूमि, तत्कालीन मौजूद तालाबों, तलैयों, बाग बगीचों पर हाथ आजमाया हालात आजादी के 67 वर्ष बाद ऐसे बने कि न तो सड़के  बची, न बाग बगीचे, ताल तलैया, नाले तक सुकुड़ कर अपने अस्तित्व की अन्तिम जंग लड़ रहे। ऐसे में शेष बची सड़कों की अंधाधुन्ध नादिरशाही अन्दाज में खुदाई और शासन की चुप्पी इस बात के स्पष्ट संकेत है कि शहर वासियों को फिलहाल किसी भी प्रकार की राहत मिलने वाली नहीं। 
क्योंकि जहां जलावर्धन आधी अधूरी अधर में है वहीं सीवर प्रोजक्ट भी फिलहाल गफलत में, ऐसे में चारों खाने चित पढ़ी व्यवस्था क्या कुछ कर पायेगी कहना मुश्किल मगर जिस तरह के हालात शहर में बन गये, या बना दिये गये है वह काबिले  गौर है। देखना होगा कि सुशासन का डंका पीटने वालो के कानो तक इस दरियादिल शहर की गुहार कब तक पहुंच पाती है। 
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