जनाकांक्षाओं पर राजनीति, बैहाल जीवन जीने पर मजबूर शहरवासी

विलेज टाईम्स, मप्र। जनाकांक्षाओं तो लगभग हर चुनाव के वक्त आम मतदाता की यह होती है कि जिसे वह अपना बहुमूल्य वोट देकर चुन रहा है वह जीतने के बाद जनभावनाओं का आदर करेगा और उनके विकास जनसुविधाओं की खातिर प्राण प्रण से जन सेवा में जुट जायेगा।
मगर विगत 25 वर्षो का शिवपुरी का इतिहास गवाह है। कि इस शहर मेें जनभावना अनुरुप ऐसा कुछ नहीं हो सका जिसकी कि चर्चा की जाये सिवाय शासकीय धन, जमीन की लूटपाट के विगत 4 दशक से शहर में सक्रिय भूमाफियाओं का ऐसा गिरोह सक्रिय है जो प्रशासनिक लोगों से सांठ गांठ कर करोड़पति, अरबपति बन बैठे है, तो कुछ शासकीय योजनाओं को ठिये ठिकाने लगा धनाढ्य बन चुके है। यहीं धमा चौकड़ी चुनाव आते ही सक्रिय हो जाती है और येन-केन प्राकरेण जिताने हराने सक्रिय हो जाती है। जिससे उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति तो होती है। मगर जनाकांक्षायें चारों खाने चित नजर आती है और चुनाव के वक्त शहर के भोले भाले लेागों को बरगला ठग लिया जाता है।

शायद शहर के आम मतदाता का नगरीय निकाय चुनावों में जो सोच बनता है वह एक ऐसे जन नेता को चुनने का रहता है जो हाथो हाथ उसकी समस्याओं का समाधान कर उसे सुन्दर और सुविधा युक्त बना सके।  न कि कोरे आश्वासन दें, स्वयं का घर भरने में मस्त हो। 
परिणाम कि धूल के ढेर में तब्दील शहर में जहां जहां खदबदाते गटर के गड्डें और गटर के पानी से सराबोर सड़क पार्क मिल जायेगें। 
मगर कसम खा-खा कर वोट कबाडऩे वाले झक कुर्ते पयचामे वाले नेता नहीं मिल पायेगें। बैचारी जनता हारथक थक कर माथा कूटने मजबूर हो जाती। 
शहर की पालिका ने तो नादिरशाही को भी मात कर दिया है। दिन भर रुपये ऐठने मे मशगूर मण्डली का आलम यह है कि वह अब इन चुने हुये नेताओं से भी दो-दो हाथ करने में पीछे नहीं रहती है। सूत्रों की माने तो झूठ बोलने में माहिर इन तनखैयाओं का आलम यह है कि अब इन्हें जनता भगवान नहीं कामधेनू गाय के रूप में दिखाई देती है। 
 वैसे भी हार थक कर शहर की जनता का स्वभाव बन गया है एक अदना सा अधिकारी तक वर्षो शहर को लूटने के बावजूद चकरघिन्नी किये रहता है मगर हमारे चुने हुये नेता उनसे सवाल जबाव तक नहीं कर पाते। 
सीवर के नाम किसी माफिया की तरह एक वर्ष से शहर खुद रहा है पैसा पूरा मगर काम जनसुविधाओं को रौंद कर हो रहा है। मगर कोई पूछने वाला नहीं कि कौन सी कार्य योजना के तहत लेागों के चलने का रास्ता बन्द कर चलने लायक सड़क तक को नहीं बनाया जाता, ऊबड़ खाबड़ रास्ते, असुरक्षित खुदाई इस बात की गवाह है कि जनसुविधाओं का इस शहर से कोई सरोकार नहीं। 
करोड़ों रुपये खर्चने व सांसद विधायक द्वारा करोड़ों की राशि जनसुविधा के नाम मुहैया कराने के बावजूद भी लोगों को साफ पेयजल नहीं मिल पा रहा। इस अराजकता पूर्ण स्थिति के लिये कौन उत्तरदायी है। दरियादिल शहर की महान जनता को सोचना चाहिए बरना यहीं हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मजबूरन लेागों को यहां से पलायन करने पर मजबूर होना पढ़ेगा। बेहतर हो कि चुने हुये नगरीय निकाय के जनप्रतिनिधि ऐसे अधिकारी, कर्मचारियों पर लगाम लगाये जिनके क्रियाकलापों से उनकी चमकदार छवि और मेहनत को बट्टा लग रहा है। क्योंकि वोट दे चुकी जनता भविष्य में सवाल इन अधिकारी, कर्मचारियों से नहीं आप से करेगी। 
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