ये कैसा अभिनन्दन , दल का अभिनन्दन और दल के दंश

मिस्टर क्लीन की छवि लेकर जन सेवा में जुटे मु यमंत्री भले ही भरोसे का कत्ल मान अभिनन्दन में मशगूल हो, मगर दाग कैसे धुले यह उनके आगे यक्ष ...

मिस्टर क्लीन की छवि लेकर जन सेवा में जुटे मु यमंत्री भले ही भरोसे का कत्ल मान अभिनन्दन में मशगूल हो, मगर दाग कैसे धुले यह उनके आगे यक्ष प्रश्र होगा।
विगत 10 वर्षो में एक नेकदिल इन्सान का भरोसा कैसे टूटा, क्यों टूटा? अगर यह घटना भर मात्र है तो इस पर सवाल खड़े करना एक नेक दिल इन्सान के साथ नइन्साफी होगी। मगर इस सत्य से भी मुंह मेाडऩा बैमानी है जो नक्कार खाने में चींख-चींख कर सवाल करना चाहता है कि क्या भोली भाली निरीह जनता के सामने झूठ का आभामण्डल तैयार कर कब तक उसे गुमराह किया जाता रहेगा और ऐसे बन्दन,अभिनन्दन का ढोल कब तक पीटा जाता रहेगा। इसमें कोई संदेह नहीं की लेाकतंत्र व लेाकतांत्रिक व्यवस्था में छवि चमकाने वाली व्यापारिक क पनियों के टिप्स के सहारे प्रायवेट लिमिटेड की तरह सत्ता बनाये रखने चलने वाली सरकारों को आखिर कितनी कीमत जन धन से चुकाना पढ़ रही है जिसके चलते व्यवस्थागत ढांचा धरासायी पढ़ा है। 
बटौना बांट सत्ता में सतत बने रहने के जुनून के क्या परिणाम हो सकते है शायद इसका बेहतर अनुभव अब दल और सरकार को मिल चुके होगें। मगर भाई लोग मानने तैयार नहीं, यह 10 वर्ष का सत्य है कि इस बीच दो कार्य सीधे तौर राहत पहुंचाने में सफल रहे। मगर सूत्रों की माने तो इससे अधिक योजनायें म.प्र. में प्रचलित है। मगर भीड़ तंत्र मान वोट की खातिर स्थापित संस्थाओं से मजाक और आने वाली पीढ़ी से धोखा हो रहा है। जिसके लिये क्षमा अक्ष य होगी। 
लेाकतंत्र का यह भी कटू सत्य है कि कोई भी दल उस सरकार और उसके मुखिया के लिये मातृ संस्था के समान होता है जो उसे सत्ता सिंहासन तक पहुंचाती है। जिसकी सेवा करना उसका परम कत्र्तव्य होता है। मगर राजधर्म जनभावनाओं जनाकाक्षंाओं की कीमत पर उसे पोषित करने की इजाजत नहीं देता। अगर मातृ संस्था की आढ़ में राजधर्म का दुरुपोग होता है तो परिणाम वह नहीं मिल पाते जिनकी अपेक्षा हर नागरिक को शासक या सरकारों से होती है शायद सबसे अहम सवालो की शुरुआत यहीं से होती है जो आज अभिनन्दन के बीच अनुत्तरित ही रही। 
बेहतर होता सरकार के पास रोजगार, सुरक्षा, संसाधनो की फेरिस्त और अमले की छवि निशकलंक होती तो अभिनन्दन काफी धार दार हो और अधिक स मानजनक बन जाता। आखिर हमारी राजनीति में ये कौन सी पर परायें जन्म ले रही है जिस जनता की बेहतर सेवा उसके कल्याण हेतु राजनैतिक दल और सरकारों को संचालित करने वाले उसके नेता आपस में ही एक दूसरे का नन्दन अभिनन्दन कर जनता के ज मों को कुरेदते रहते है। 
बेहतर हो ऐसे दल और इनके नेता 10 वर्ष सरकार के पूर्ण होने पर छात्रवृति, डीमेट, खनन, व्यापम जैसी लेामहर्षक घोटालो की समीक्षा करते विचार होता कि प्रदेश के 70 फीसदी के लगभग बच्चों में खून की कमी क्यों? बात होती कि 60 फीसदी बच्चों को क्यों भरपूर खुराक नहीं मिल पाती जिसका आंकड़ा लगभग 60 फीसदी के आसपास है। क्यों महिला उत्पीडऩ के मामले कम नहीं हो रहे, क्यों म.प्र. शराब बिक्री का हब बनता जा रहा है गांवो में अचानक इन 10 वर्षो में मजदूरी में कमी क्यो आई इतनी सारी ग्लोबल मीट और विदेशो दौरो के बावजूद प्रदेश में उघोग स्थापित नहीं हो सके। क्यों आज भी शिक्षा का स्तर शासकीय स्कूलो में घटिया है जब तीन वर्ष से कृषि उत्पादन पुरुस्कार ले रहे है तो फिर प्रदेश के किसान आत्महत्या क्यों कर रहे। क्यों प्रदेश के 75 फीसदी लेाग शुद्धपेयजल के लिये भटक रहे है। क्यों शासकीय अधिकारियों के यह छापो में करोड़ों तो शासकीय अधिकारी, कर्मचारी, पैसे लेते पकड़ रहे। यह भी अभिनन्दन कत्र्तव्यों को नहीं भूलना चाहिए कि सरकार दल का चेहरा और सरकार के कर्मचारी अधिकारी सरकार का चेहरा होते है। जब समुची मशीनरी में ही भ्रष्टाचार पसरा पढ़ा है और अंहकार सर चढ़कर बोल रहा है ऐसे में इस तरह की टीका टिप्पणी ऐसे शुभ मौके पर गुस्ताखी करार दी जा सकती है। बैसे भी ऐसी सरकारों और दलो को इस सच्चाई को सुनने पढऩे की फुरसत कहा। सभी तो जय, जय, जय कार में जुटे है और जनता मूकदर्शक बन यह तमाशा देख रही है काश दल और सरकार जनता के  इस दर्द को मेहसूस कर 10 वर्ष पूर्ण होने पर सुधार की दिशा में कोई ऐतिहासिक निर्णय का संकल्प ले पाती तो जनता के ज मों पर सच्चा मरहम और सच्ची सेवा होती है। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: ये कैसा अभिनन्दन , दल का अभिनन्दन और दल के दंश
ये कैसा अभिनन्दन , दल का अभिनन्दन और दल के दंश
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