अभावों की आढ़ में, कब तक चलेगा अराजकता का खेल

व्ही.एस.भुल्ले.  आजादी से लेकर आज तक आभावों का रोना कोई नई बात नहीं, क्योकि आपने 67 वर्षो में कोई ऐसा सिस्टम ही पैदा नहीं किया जिससे माननी...

व्ही.एस.भुल्ले. आजादी से लेकर आज तक आभावों का रोना कोई नई बात नहीं, क्योकि आपने 67 वर्षो में कोई ऐसा सिस्टम ही पैदा नहीं किया जिससे माननीयों आप समझ पाते या हम समझा पाते कि आभाव कहा है। एक था सां यकीय विभाग, जो मलाई दार न होने के चलते आज अपने अस्तित्व की अन्तिम जंग लड़ रहा है। 


काश बढ़ती आबादी व मौजूद संसाधन जरुरतों के आंकड़े बने रहते तो आप जैसे दान दाताओं के हमारे बीच रहते हम शिक्षित, सुरक्षित और भय मुक्त खुशहाल जीवन जी पाते, फिर न तो आपके दल, आपके समर्थकों के बैवजह ऊल जुलूल व्यान व सड़कों पर आय दिन होने वाली अराजकता देख चाहे जब हम नहीं सहर पाते, माननीयों आप और आपके श्री श्रीमान तो संगानों के साये में चैन की नींद सो लेतेे है, मगर हम आप लेागों द्वारा तैयार किये गये माहौल तिल-तिल कर जी रहे है। उस पर संसाधनों का आभाव माननीयों बढ़ाइये न संसाधन आप लोगों को किसने रोका है। और लगाइये टेक्स किसने आपको टोका है बैसे भी तो हर नागरिक औपचारिक अनौपचारिक तौर पर जम कर टेक्स दे रहा है। सेवा हो या फिर जरुरत की कोई भी वस्तु हर चीज पर तो टेक्स दे रहा है। फिर संसाधनों का आभाव कैसा ?

माननीयों क्या आपको पता है अराजकता, बल्वा होने पर उसे रोकने की शुरुआत घन्टे भर बाद गिड़गिड़ाने, समझाने से शुरु हो पाती है। और न्याय, सुरक्षा की कहानी संसाधनों के  आभाव में बदल जाती है। क्योंकि आपके श्रीमान भर्ती होने से लेकर रिटार्यमेन्ट तक आपको नहीं समझ पाते कि 18 लाख की आबादी को सुरक्षा देने 1000 अधिकारी, कर्मचारी नहीं जिनमें से 30 फीसदी तो आम नागरिक की सुरक्षा से इतर रहते है। उससे कहीं अधिक ज्यादा लगते है थाने कोतवाली में मगर वहा भी हालत विपरीत रहते है, आखिर क्यों ? 

क्यों समय-समय पर सुरक्षा की समीक्षा नहीं होती, क्यों समय-समय पर शिक्षा स्तर उसकी गुणवत्ता की बात नहीं होती। 

माननीयों ये दर्द है हमारा है हमें नहीं चाहिए बेवजह का बटने वाला बटौना कम से कम हमें शिक्षा, सुरक्षा तो दो बाकी देश का बच्चा-बच्चा स्वयं के विकास के लिये तैयार है। आप संसाधनों का रोना छोड़, हर नागरिक में यह भाव तो जगाइये कि आप सुरक्षित है और शिक्षा के लिये हर संसाधन मौजूद है। देखियें देश-प्रदेश कैसे विकास नहीं करता, न बचेगी सड़कों पर पसरी अराजकता न ही दिखेगें बैहाल लेाग। यहीं दर्द है हमारा दिक्कते फिर चाहे जो भी हो, हम संघर्ष करने तैयार है। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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अभावों की आढ़ में, कब तक चलेगा अराजकता का खेल
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