सतत सत्ता स्वार्थ, वोट की मजबूरी, कहीं ले न डूबे लोकतंत्र

स्वयं के द्वारा स्थापित लेाकतांत्रिक व्यवस्था में स्वयं के द्वारा स्वयं के लिये चुनी सरकार सतत सत्ता और वोट हासिल करने हमारी सरकारें कभी इतनी बैवस, मजबूर हो जायेंगी, कभी किसी ने सपने मेंं भी न सोचा होगा। 


जिसके दुष्परिणाम आज कत्र्तव्य विमुख व्यवस्था में फैली अराजकता, अलाली के रुप में सामने आने लगे है। जबकि लेागों के खुशहाल जीवन के लिये सरकारे प्रयास रत है, नेता चिन्तित है। मगर लोग आज भी बैवस हो कलफ रहे है। क्योंकि आज कत्र्तव्य विमुख व्यवस्था में अराजकता पसरी पढ़ी है। ऐसे में मामला कत्र्तव्यों को लेकर हो या फिर अधिकारों को लेकर जिसमें स यता संस्कार रैगने पर मजबूर हो। ऐसे में खुशहाल जीवन की कल्पना बैमानी साबित हो जाती है। 
सतत सत्ता स्वार्थ हमारी लेाकतांत्रिक व्यवस्था पर इस हद तक हावी है कि वोट के फेर में कोई भी सच बोलने तैयार नहीं। यहां कि कई सरकारों के मुखिया उनके मंत्री वोट बैंक कायम करने की गरज से सारी मर्यादायें तोड़ रहे है। तो कुछ पानी पी पी कर लेागों में यह विश्वास जता रहे है कि कोई माई का लाल नहीं जो उनके रहते आरक्षण खत्म हो। 
ये सही है कि दबे, कुचले, पिछड़ो का संरक्षण होना चाहिए। मगर अन्य वर्ग ऐसे व्यानो से स्वयं को आतंकित और असहज महसूस करे तो यह सिर्फ और सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिये वोटो की मजबूरी के अलावा कुछ भी नहीं। मगर ऐसी स्थति में हम इसे हमारे लेाकतंत्र का सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य यह अजीब पहेली बनता जा रहा है। 
शासकीय भूमियों पर बढ़ते अवैध कब्जे, सरेयाम बिजली चोरी, चरम पर भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध इन सत्ता सीनों को आयना दिखाने न काफी साबित हो रहे है। 
मगर कहते है कि समय सब कुछ ठीक कर देता जिस तुष्टीकरण की नीति के तहत देश 67 वर्ष का सफर तय कर यहां तक पहुंचा है उससे निजात पाना तब तक आसान नहीं होगा जब तक देश के सच्छे सपूत निराशा का भाव छोड़ देश सेवा जन सेवा के लिये कमर नहीं कस लेते और यह तभी स ाव है जब युवा आगे आये और शेष मौजूद लेाकतंत्र समर्थक शैया पर पीढ़ी हमारी व्यवस्था में जान फंूक पाये, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब समुचा लेाकतंत्र ही बैवस और लाचारी में डूबा नजर आये।  
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