लेाकतंत्र में क्यों मजबूर है, राजधर्म ?

किसी भी राष्ट्र में लेाकतंत्र से बढ़कर मानव कल्याण के लिये कोई और व्यवस्था हो ही नहीं सकती, इसलिये लेाकतंत्र को महान कहा जाता है। मगर भारत...

किसी भी राष्ट्र में लेाकतंत्र से बढ़कर मानव कल्याण के लिये कोई और व्यवस्था हो ही नहीं सकती, इसलिये लेाकतंत्र को महान कहा जाता है। मगर भारत की महान लेाकतांत्रिक व्यवस्था में राजधर्म क्यों मजबूर है यह स य समाज के सामने आज यहीं यक्ष प्रश्र है। 

कारण साफ जब अंहकार, चापलूसी, स्वार्थ, कूटरचना, मित्या प्रचार का स्थान अहम हो जाये तो लेाकतंत्र का मजबूर होना स्वभाविक है। मगर यहां कुछ अन्य सवालो की चर्चा भी जरुरी है। ये सच है कि भारत विकास के क्षेत्र में एक तेजी से बढऩे वाला राष्ट्र है जिसके आचरण में बदलाव आना भी स्वभाविक है। जिसका कारण समाज में आ रहे कई बदलाव को एक प्रमुख कारण माना जा सकता है। जिस समाज में चापलूस, अहंकारी, स्वार्थी, कूट रचना रचित, मिथ्या प्रचार करने वालो का प्रभाव बढ़ रहा हो, वहां नैतिकता, राष्ट्रीयता रैंगने पर मजबूर हो जाती है। ऐसे में जरुरत है मजबूर राजधर्म को ताकत देने की। क्योंकि राजधर्म जनकल्याण राष्ट्र कल्याण में किसी की परवाह किये बगैर राजधर्म अपना कत्र्तव्य निभाता है। और राजधर्म के पालन में वह वेबुनियाद बातों की परवाह नहीं करता है। और न ही करना चाहिए, क्योंकि लेाकतंात्रिक व्यवस्था में हर एक दल, व्यक्ति अपनी जनकल्याणकारी, राष्ट्र कल्याणकारी नीतियों के क्रियान्वयन का समय निर्धारित होता है। मगर लेाकतंत्र में एक गैंग की तरह सक्रिय राजनैतिक सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक संगठन आज अंहकार, चापलूसी, स्वार्थ, कूट रचना, मिथ्या प्रचार के शिकार है। ऐसे में महान लेाकतंत्र खुशहाल भारत के लिये हर भारत वासी को राष्ट्र व जनकल्याण में एक अलग सोच के साथ आगे बढऩा होगा यह सही है कि लेाकतंत्र की कीमत पर लेाकतंत्र के नाम पर यह खेल अनादी काल से चला आ रहा है।

मगर परिणाम आज भी प्रमाणिक नहीं, दावे कोई कितने ही क्यों न करे। मगर सच यहीं है कारण साफ है कि एक सर्व मान्य सत्य के लिये दूरगामी पारदर्शी कसौटी पर कसे हुये प्रयास नहीं हुये, बल्कि इसके उलट राष्ट्र कल्याण, जनकल्याण के नाम सतत सत्ता में बने रहने की ऐसी अन्धी दौड़ शुरु हुई। जिसने एक अलग समाज और अराजकता पूर्ण व्यवस्था बना डाली। उदाहरण सामने है, गरीबों की लड़ाई लडऩे वाले तो लखपति, करोड़पति ही नहीं अरबपति हो लिये, मगर गरीब आज भी वहीं का वहीं खड़ा है। अब्वल इस महा विकास के बीच वह रोटी कपड़ा, मकान से तो मोहताज था ही। अब तो वह प्रकृति प्रदत्त शुद्ध पेयजल से भी मोहताज हो चला। 
संसाधन स पन्न व्यवस्था ऐसी कि वह देखती भी है, सुनती भी है, मगर करती कुछ भी नहीं और अब तो धीरे-धीरे हालात ऐसे बनते जा रहे है। कि वह चाह कर भी कुछ करने की स्थति में नहीं। यहीं बात आज राजधर्म को लेाकतंत्र में मजबूर बना रही है। 

बेहतर हो देश समीक्षा कर सत्ता, स्वार्थ, अहंकार, चापलूस, भ्रामक प्रचार से इतर प्रमाणिक कार्य, व्यवहार की शुरुआत करे, बरना देर होते, देर न होगी। समय है कि हम राष्ट्र कल्याण, जनकल्याण की खातिर मानव जाति के लिये ही नहीं समुची प्रकृति की रक्षा के लिये एक जुट हो आगे बढ़े, तभी हम एक खुशहाल भारत बना पायेगें। 

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