हंगामा , उत्तेजक भाषण नहीं, देश को संसाधनों की दरकार

व्ही.एस.भुल्ले. शौध प्रतिरोध, अहंकार की जंग में तब्दील होते हमारे महान लोकतंत्र में देश को हंगामा उत्तेजक भाषणों की नहीं संसाधनों की जरुरत है जिसके लिये एक जबावदेह व्यवस्था की जरुरत है जो जनाकांक्षा अनुरुप परिणाम दे पाये। जिस तरह से अहम, अहंकार को लेकर लेाकतंत्र को आज तक चलाने का प्रयास हुआ या फिर वर्तमान में हो रहा है वह राष्ट्र व जनहित में कदापि नहीं। 


राष्ट्र व जनहित में जरुरी है कि हमारे चुने हुये जनप्रतिनिधि या उनके द्वारा चुनी गई सरकारे अपने वैचारिक, व्यक्तिगत स्वार्थो से इतर लेाकतंत्र के मन्दिरों में राष्ट्र व जनहित के लिये राजनीति करे, प्रयास करे  कि वह ऐसी कौन सी नीति, कानून हो सकते है। जिससे शिक्षित, सुरिक्षत, खुशहाल एवं स पन्न राष्ट्र का निर्माण हो सके। फिलहॉल आजादी के 67 वर्षो का इतिहास हमारे सामने है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता कि आजादी के 67 वर्षो में राष्ट्रहित, जनहित, जनकल्याण, सुरक्षित राष्ट्र और खुशहाल भारत निर्माण के लिये प्रयास नहीं हुये मगर विस्फोट की तरह बढ़ती हमारी आबादी ने हमारे संसाधान सीमित और वोटों की मजबूरी ने तृष्टिकरण भाव को जागृत कर राजनीति को सत्ता, लोलुप और समाज को लालची बना दिया। जिसके लिये भाई लेाग कुछ भी कर रहे है। परिणाम कि हमारी लाख कोशिसो के बावजूद भी हमें सार्थक परिणाम नहीं मिल पा रहे और जबावदेही के आभाव में बढ़ती अराजकता, अलाली समुची व्यवस्था में पसरी पढ़ी है। सुकुड़ते संसाधन इतने सीमित कि खुशहाल जीवन के लिये लेागों में हाय तौबा मची है। हालात यह है कि व्यक्तिगत स्वार्थ तथा सतत सत्ता और रातो रात कुबेरपति बनने की होड़ आज हमारे लेाकतंत्र पर हावी है। क्योंकि वोट बैंक आज तृष्टिकरण का मोहताज होता जा रहा है। जिससे राष्ट्र व समाज को बचाना हमारी भी जबावदेही बनती है और यह तभी स भव है जब हम सब मिलकर इस दिशा में कार्य करे क्योंकि लोकतंत्र को चलाने वाले जनप्रतिनिधियों को हम चुन कर सदनों तक भेजते है। जो एक सरकार चुन आपसी समन्वय से देश, समाज और अपने नागरिकों के बेहतर सुरक्षित भविष्य के लिये नीति नियम बना उनका क्रियान्वयन कराते है। 
नागरिकों चाहिए कि वह जनप्रतिनिधियों का चुनाव करते वक्त यह ध्यान अवश्य रखे कि कौन सा जनप्रतिनिध सच्चा और अच्छा रहेगा कौन जनप्रतिनिधि हमारा बेहतर भविष्य गढ़ सकता है। जो देश व देश में मौजूद विभिन्न समाजों के लिये भी राष्ट्रहित, समाज हित में उचित मार्गदर्शन कर सके। 
चुने हुये जनप्रतिनिधि भी देश व नागरिकों के हित में क्या बेहतर हो सकता है। सदनों में अपने विचार, आयडिया खुलकर रखे, साथ ही सरकार के संरक्षण में इस बात का भी याल रखे कि क्या कार्यपालिका निशंसकोच भाव से उन नीति नियमों का ठीक से पालन कर रही है। जो राष्ट्र व जनहित में उनके द्वारा बनाये गये है साथ ही व्यवस्था के साथ सहयोगात्मक रुख रखते हुये अपनी सकारात्मक भूमिका निभाये। 
सरकारों को चाहिए कि वह कार्यपालिका द्वारा चुने हुये जनप्रतिनिधियों से देश व नागरिकों की जरुरतों का अध्ययन करा व देश के लिये आवश्यक संसाधन जुटा, नीतियों के माध्यम से ऐसे कानून बना, उनका क्रियान्वयन कराये। जिनके परिणाम राष्ट्र ही नहीं राष्ट्र का हर नागरिक उन्हें महसूस कर सके। 
अगर हमारी सरकारे शिक्षा सुरक्षा और बेहतर व्यवस्था देने में कामयाब रही तो निश्चित ही भारत को एक शक्तिशाली, खुशहाल भारत बनने से कोई नहीं रोक सकता। 
इसलिये देश के नागरिक, चुने हुये जनप्रतिनिधि, सरकारों को कम से कम शिक्षा, सुरक्षा जैसी अतिआवश्यक देश की जरुरतों पर संसाधन अभाव का रोना रोना बन्द कर पूरी ताकत से देश में शिक्षा और सुरक्षा के लिये जुट जाना चाहिए जिसके लिये न तो सरकारों को धन का आभाव रखना चाहिए न ही संसाधनों तभी विश्व ही नहीं देश में एक प्रमाणिकता सिद्ध कर लेागों को बेहतर भविष्य का आभास करा पायेगें और एक जबावदेह व्यवस्था दे पायेगें। 
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