आजादी के 67 वर्ष, कानून के आभाव में जघन्य बलात्कारी रिहा

व्ही.एस.भुल्ले. माननीय हम तो पहले से ही कह रहे है कि हमारे श्रीमान हमारी सुनते नहीं, हमें क्या पता था कि सारी ढील पोल आपकी है। तभी तो संत श्री मुनिश्री तरुण सागर महाराज को हरियाणा के पलबल में कहना पढ़ा कि बलात्कारी नाबालिक नहीं, बल्कि देश का कानून नाबालिक है और यह किसी भी लेाकतांत्रिक देश के लिये शर्मनाक है। जब तक देश का कानून बालिक नहीं होगा, निर्भया काण्ड जैसे काण्ड होते रहेगें और इसके लिये अदालत नहीं बल्कि संसद जि मेदार है। 

उन्होंने आगे कहा जिस तरह से काश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है। उसी तरह सड़क से लेकर संसद तक भ्रष्टाचार एक है। भ्रष्टाचार से भ्रष्टाचारी भले ही पनप रहे हो, पर देश नष्ट हो रहा है। 
माननीयों शायद आपने राजनीति ने आने से पूर्व राजनीति शास्त्र पढ़ा होता तो प्लेटो जैसे विद्वान के शिक्षा सिद्धान्त से कुछ सीखा  होता जिसमें उस विद्धवान ने लिखा था कि भय न्याय का पुत्र होता है।

 अब माननीयों हम इस महान लेाकतंत्र को अपना सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य जिसमें आजादी के 67 वर्ष बाद कारगार कानून तो दूर की कोणी हम तो किसी भी राष्ट्र की अहम कड़ी कहे जाने वाली यूनिट परिवार, समाज, स यता, संस्कार, संस्कृति को भी नहीं बचा सके। आज देश में धर्म का जुनून ऐसा कि संस्कार, स यता, शिक्षा विहीन हो हम अब तो धर्म का अर्थ भी भूलते जा रहे है और बैवजह एक ऐसे रास्ते पर चल निकले है जहां अब सबसे बड़ा धर्म संस्कार, स यता, संस्कृति का आकलन सत्ता आधारित हो चला, जहां गाहे-बगाहे सं या बल ही सर्वोच्च हो रहा है और लेाकतंत्र का े आधार भी बन रहा है।

मगर सबसे बड़ा अफसोस तो यह है कि जिस लेाकतंत्र पर उस राष्ट्र, समाज, परिवारों के सुरक्षित खुशहाल जीवन की जि मेदारी है। उस लेाकतंत्र की पहली शर्त सं या बल से शुरु होती है। और जिसका सं या बल अधिक उस लेाकतंत्र में सत्ता भी उसी की होती है जहां सं या बल के आधार पर राष्ट्र की खुशहाली के लिये नीति निर्धारित होती है। ऐसे में जिस राष्ट्र का सं या बल 1 अरब के पार हो। और वह राष्ट्र एक जघन्य बलात्कारी को उसके जघन्य जुर्म के मुताबिक सजा देने एक कानून का मोहताज हो। जहां 67 वर्ष में किसी नाबालिक जघन्य अपराधी को माकूल सजा के लिये कानून न बन सका हो, उस राष्ट्र के माननीयों द्वारा उस राष्ट्र को दी जा रही सेवाओं को समझने कॉफी है। 

अगर मेरी याददास्त ठीक है तो मैंने राजनीति शास्त्र की शिक्षा लेते वक्त सुना था कि मौजूद कानून के रहते अगर कोई मसला माननीय न्यायालय के समक्ष ऐसा आ जाये, जिसका निराकरण मौजूद कानून के तहत न हो, तो ऐसे में माननीय न्यायालय जो फैसला देगा। वह स्वत: ही कानून बन जाता है। 

मगर यहां यह उल्लेख करना भी आवश्यक है। क्योंकि आधी रात सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाने पर शीर्ष अदालत ने साफ कह दिया कि जुबेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत नाबालिक की सजा पूरी हो चुकी है, लिहाजा हम कानून से आगे कदापि नही जा सकते। और यह सही भी है, क्योंकि कानून बनाने की जबावदेही माननीयों आपकी होती है न कि न्यायालय की। अब महान लेाकतंत्र में माननीयों यक्ष प्रश्न यह है कि 16 दिस बर 2012 को घटित जघन्य सामूहिक बलात्कार की घटना को लेकर देश भर में मचे कोहराम को देख लेाकसभा में तो कानून पास हो जाता है, मगर  7 महीने तक राज्य सभा में पढ़े रहने के बाद और कानून के आभाव में जघन्य अपराधी को छूट जाने के बाद आखिर क्यों पढ़ा रहा, किसका इन्तजार होता रहा। कौन है उस राष्ट्र को ऐसी सेवाये देने का जि मेदार।  

जबकि इस बीच अहम अंहकार को लेकर कई मर्तवा हंगामा, बहस चलती रहती है, मगर माननीयों आपके श्रीमान आपके ही नहीं, समुचे लेाकतंत्र के माथे पर कालिख पुतवाने में पीछे नहीं रहे। मीडिया चिल्लाती रही, बहस कराती रही कि कब किस दिन रिहा होगा कानून के आभाव में जघन्य बलात्कारी मगर माननीयों एजेन्सियों के सहारे छवि चमकाने मेंं व्यस्थ व अहंकार की लड़ाई लड़ रहे दल गत लोगों को फुरसत ही नहीं मिली। जो एक रोती बिलखती मां की आवाज सुन पाते। काश माननीय, श्रीमान समय रहते, उस निर्भया की चीथ पुकार आपने सुनी होती तो आज यह दिन देश को न देखना पड़ता। 
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