लोकतंत्र की भ्रूण हत्या, गलत

वीरेन्द्र शर्मा/विलेज टाईम्स, अक्टूबर 2015। आज जब समूचे विश्व में लेाग तानाशाही की तबाही से तौबा कर अपना अस्तित्व बचाने कड़ा सघर्ष कर रहे है तो कुछ लोकतांत्रिक रास्ते से लेाकतंत्र की ओर बढ़ रहे है। ऐसे में लेाकतंत्र की भ्रूण हत्या का प्रयास उस महापाप के समान है जो समुची लेाकतंात्रिक व्यवस्था में असन्तुलन की स्थति पैदा कर सकता है।  


जब बात सामूहिक हो तो व्यक्ति गत प्रतिष्ठा या अंहकार का कोई स्थान नहीं होना चाहिए क्योकि देश की लेाकतंात्रिक व्यवस्था में पंचायती राज एक भ्रूण के समान है। जिसको संरक्षण देना संविधान ही नहीं सरकारों का भी काम है। अगर ऐसे में इन्हें ठीक रास्ता न दिखा सीधे दमन करने का कार्य होगा तो फिर लेाकतंत्र में अच्छे नेता कहा से आयेगें। क्योंकि  आज भी भारत लगभग 80 फीसदी गांव, कस्बो में बसता है। जहां पंचायती राज चलता है। 

जब सरकार संवदेनशील है उसमें बैठे नेता संवेदनशील है और हमारे अधिकारी निपुण कत्र्तव्यनिष्ठ है तो फिर अधिकारों का हो हल्ला तथा आवाज उठाने के खिलाफ स त कार्यवाही  का प्रचलन कैसा। कम से कम अब तो विदेशी हुकूमत नहीं, मगर दुर्भाग्य कि इतनी अहम बातों पर लगभग सभी प्रमुख राजनैतिक दल समाजसेवी अन्ना, बाबा, साहित्यकार सभी चुप है। आखिर क्यों, क्यों चुप है। वो मु यमंत्री जो 18-18 घन्टे जनसेवा में जुटे रहने का दावा करते है। बेहतर हो, वे आगे आये और समझाये कि आखिर पंचायतीराज को सफल बनाने और जन-जन तक स्वराज पहुंचाने  कौन सा रास्ता सटीक है। 
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