तत्कालिक लाभ के संघर्ष में, सिसकता लोकतंत्र

इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि जो संघर्ष तत्कालिक लाभ के लिये हमारे लेाकतंत्र में छिड़ा है उसकेे चलते अब हमारा महान लेाकतंत्र सिसक रहा है। कानून की किताबों में तो सब कुछ ठीक ठाक है। मगर क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। परिणाम कि स्वयं के स्वार्थो में सना हमारा तत्कालिक लाभ का लालच सर चढ़कर बोल रहा है। 

जिसमें क्या मूल्य, सिद्धान्त, पर परा, संस्कार, संस्कृति सभी स्वाहा होते जा रहे है, ग्लोबलाइजेशन के दौर में अब धन भगवान और बाकी सब हैवान नजर आ रहे। जिसके लिये लेाग सब कुछ भुला अधिक से अधिक धन अर्जन कर लेना चाहते है। 
मानव जीवन में बढ़ती बिलसिता की मांग ने जो कई रुपों में हो सकती  हैै ने आम आदमी को अन्धा कर रखा है, जिनके आचरण देख अब लेाकतंत्र की भगवान कही वाली जनता भी तत्कालिक लाभ पाने के रास्ते पर चल पढ़ी है। 
जिससे बदरंग होता लेाकतंत्र धीरे-धीरे लूट तंत्र की ओर अग्रसर हो रहा है। राजनैतिक दलो के ल बे चौड़े संकल्प नेताओं के बड़े-बड़े भाषण और कार्यपालिका में पसरी अलाली का सन्नाटा और चापलूसी शौर इस बात का प्रमाण है कि हमारे महान लेाकतंत्र में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। 
माननीय न्यायालय निर्णय दे रहे है मगर पालन कराने विधायिका से जुड़े नेता कार्यपालिका के अधिकारियों की अलाली  से मायूस हो लोग पुन: न्यायालय में जा, न्याय ले पा रहे है। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे लेाकतंत्र में देखने मिल जायेगें। 
जिसकेे चलते लेाकतंत्र के महाकुंभ कहे जाने वाले चुनाव भी अब प्रभावित हो रहे है। आखिर देश की आवाम कैसे गुन्डे मवाली, माफियाओं को लेाकतंत्र के मन्दिर लेाकसभा विधानसभाओं में वोट दे पहुंचा रही है। 
मगर ग्लोबलाइजेशन के दौर में वोट की खातिर सब कुछ चल रहा है तथा स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के नाम हर येक, अनजान विषयों पर भी अपने विचार रख रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ऐसी कि न तो छोटा बड़े का याल, न ही बड़ा व्यक्ति अपनी गरिमा का याल रख रहा है। व्यक्ति तो व्यक्ति अब तो पदो को भी नहीं व शा जा रहा, न पदो पर बैठे लेागों द्वारा उस पद की गरिमा का याल रखा जा रहा और न ही कोसने वाले पद गरिमा का याल र ा पा रहे।
स्वयं भू रायचन्दो का हमारे लेाकतंत्र में खासा मजमा लगा है और अपनी अपनी टोली बना, एक दूसरे को महान कहने का क्रम चल ही निकला है, अगर इतिहास ऐसे ही बनते है तो इन्हें रोका जाना चाहिए। और तत्कालिक लाभ के संघर्ष से लेाकतंत्र को बचाना चाहिए। क्योंकि लेाकतंत्र में मूल्य सिद्धान्त, संस्कार, संस्कृति को छोड़ सारा संघर्ष तत्कालिक लाभ पर आ टिका है। तो यह लेाकतंत्र ही नहीें देश व मानव समाज के लिये शुभसंकेत नहीं। 
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