बगैर स्वराज, असंभव खुशहाली

विगत 67 वर्षो से नित नये ढंग से देश की खुशहाली के लिये चल रहे आधे अधूरे प्रयोगों ने देश को प्रयोगशाला और आवाम को प्रयोग सामग्री बना छोड़ दिया है। जिससे देश हाली आज भी कोसो दूर नजर आती है। स्वार्थ परख न्याय के सिद्धान्त ने आज अराजकतापूर्ण स्थति पैदा कर देश को जाति, धम की आग में झौंक दिया है। जिससे खुशहाली की उ मीद बैमानी साबित होने लगी है और राष्ट्रीय भाव खतरे में, मगर वोट की राजनीति करने वाले भाई लेाग आज भी सत्ता के लिये अन्धी दौड़, दौड़ सतत सत्ता सुख की ओर अग्रसर होते जा रहे है।


खुशहाल भारत के लिये 67 वर्ष से चल रहे प्रयोगों में न जाने कितने अनुभव, जवानी, बचपन घुटन भरे जीवन में दम तोड़ चुके है। मगर खुशहाल भारत का सपना दिखा सतत सत्ता सुख भोगने वाले आज भी सत्ता मोह त्यागने तैयार नहीं, अफसोस तो हमारे महान भारत में अब यह है कि कोई राष्ट्र व देश की आवाम के लिये निस्वार्थ कुर्बानी देने तैयार नहीं। 

उस पर से भाई लेागगों ने एक लकीर और खींच रखी है कि 5 वर्ष बहुत ज्यादा सुधार नहीं हो सकता। क्योंकि लेाकतंत्र है तो किसी को 10 तो किसी को 20 वर्ष तक सत्ता चाहिए। 
मगर कड़वा सच यह है कि लगातार 10 से 35 वर्षो तक सतत सत्ता में बने रहने ाक रिकार्ड है, मगर सुधार के बजाये हालात और खराब हुये है कारण साफ है कि न्याय के सिद्धान्त से धोखा औद दृढ़ इच्छा शक्ति के आभाव में त्याग का हास हुआ है। 

मगर यहां सबसे यक्ष प्रश्र यह है कि जब देश में परिणाम लाने 5 वर्ष की सत्ता का प्रावधान फिर 10-10 या 20-20 वर्षो तक की सत्ता का क्या काम? 
आखिर वोट नीति के आगे कैसे देश व आवाम की खुशहाली के लिये निर्णय नहीं हो पाते अगर हो भी जाते है तो वह निर्णय क्यों क्रियान्वित नहीं हो पाते। 
आखिर हमारी व्यवस्था के बीच राष्ट्र में कुछ तो ऐसा गलत हो रहा है। जो खुशहाल जीवन में बाधा बना हुआ है। 
हालात यह है आवाम के बीच लेाकतंत्र के नाम अराजकता इतनी बढ़ चुकी है कि अब संवैधानिक संस्थाओं की पहुंच न काफी साबित हो रही है और लोग स्वतंत्रता के नाम एक दूसरे का जीवन नरक बनाने पर तुले है और सत्ता सौपान से जुड़े लोग अंहकार में डूब मनमानी करनें में लगे है। क्योकि अब धीरे-धीरे आवाम वोट देने की मशीन और दलो को सत्ता में बने रहने का माध्यम बन कार्यपालिका के भरण पोषण का माध्ययान बन चुकी है। 

कारण साफ है जो करने लायक है वह सबसे पहले स्वयं या उनसे सरोकार रखने वालो के बारे में सोचना चाहते है। जो चिल्लाते है या तो उन्हें स्वयं में आत्मसात कर शेष को कुचलना चाहते है। जिसके चलते अब हमारी लेाकतांत्रिक व्यवस्था में दो वर्ग बन चुके है। एक वो जो हर तरह से स पन्न है जिनके पास सत्ता या धन है, दूसरा वह वर्ग जो सत्ता व धन विहीन है इनके अलावा चालाको का एक उत्प्रेरक वर्ग भी है। जो सत्ता व धन वालो के लिये स्वयं के जमीर को मार कर दलाली में जिन्दा बना हुआ है। 
ऐसा स्थति में खुशहाल भारत का सपना कैसे पूरा हेगा, सवाल सभी के सामने है। 

इसलिये आज जरुरत है उस स्वराज के लिये कड़े संघर्ष की जिसकी कल्पना कभी गांधी, नेहरु, पण्डित दीनदयाल, डॉ. लेाहिया ने की और संघर्ष पूर्ण जीचन जिया और यह तभी स भव है जब देश का युवा स्वयं के स्वार्थ छोड़ देश व समाज के लिये सोच खुशहाल भारत निर्माण जुटे, बरना अराजकता का यह रास्ता बहुत दूर तक जाने वाला नहीं है। 
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