कराहता लेाकतंत्र, राजनीति को प्रशिक्षण की जरुरत

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तरह के गैर जि मेदारना व्यानों की बाढ़ भारतीय राजनीति में आ रही है वह कोई अप्रत्याशित नहीं क्योंकि स्वच्छन्द राजनीति के संस्थान ही देश में बन्द हो गये है। अगर यो कहे कि म.प्र. में तो बिल्कुल ही बन्द है, तो कोई अतिसंयोक्ति नहीं होगी। जिसके चलते अब प्रशिक्षण की कमान या तो उन राजनैतिक दलो के  हाथों पहुंच चुकी है जो या तो प्रायवेट लिमिटेड की तरह काम करते है या फिर कट्टरबादी विचार धारा के साथ काम करते है। जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या फिर लेाकतंत्र के लिये कोई स्थान नहीं है। 

रही सही कसर उन लेागों ने पूरी कर दी, जो लेाकतंत्र का दम निकाल  संगठन के नाम आम जनता का कचूमर निकालने में लगे है जो लाभ के पद रहकर लेाकतंत्र में संगठित है। फिर चाहे वह सरकारी संस्थान हो या फिर प्रायवेट संस्थान परिणाम कि प्रशिक्षित पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी अब पूर्ण रुपेण भारतीय राजनीति से बिदा ले चुकी है और उद्दंड लापरवाह, गैर जि मेदार स्वार्थी लेागों की पूरी की पूरी जमात राजनीति पर हावी हो चुकी है। 
हालत ये है जिन वोटों पर सरकारे बनती बिगड़ती है वह अब वर्तमान व्यवस्था की हालत देख अपना भूत भविष्य भुला केवल वर्तमान में ही नहीं, केवल और केवल आज या अभी मैं जिन्दा रहने को मजबूर हो चुके है। जिसका लाभ उठा हमारे राजनैतिक दल जहां सतत सत्ता में बने रहना अपना लक्ष्य बना चुके है। वहीं महात्वकांक्षी धन लालची सिर्फ पैसा बनाने में लगे है और उसके लिये वह कुछ भी कर रहे है। तथा कुछ भी करने तैयार है। कोई जबावदेही नहीं इनकी क्योंकि इस दौड़ में कोई पीछे रहना नहीं चाहता और जल्द से जल्द लक्ष्य हासिल करना चाहता है। 
प्रशिक्षण विहीन राजनीति से निकले संवैधानिक पदो पर शपथ लेकर बैठने वाले लेाग अपने ही लेागों के  बीच सफेद झूठ बोलने से नहीं हिचकते व इनके कारिन्दे उस झूठ को आगे बढ़ाने फैलाने से नहीं चूकते, मगर सबसे बड़ी शिकायत हमें हमारे पढ़े लिखे बुद्धिजीवी, विद्वान उन अधिकारियों से है जिन्हें संविधान ने खुला संरक्षण दे उन्हें सही नीति क्रियान्वयन की जि मेदारी और संवैधानिक अधिकार सौंप रखे है। जिन्हें देश का कानून, मेाटी तन्खाह, बंगले गाड़ी सुख सुविधा, शक्ति प्रदान करता है। आखिर वे कैसे पंगू हो गये, क्योंकि इस तरह के गैर जि मेदार दल, नेता तो 5 वर्ष के लिये चुने जाते है। आप तो 60 वर्ष की उम्र तक सत्ता में रहते हो। 
सोचिये आज आम नागरिक बगैर कोई अपेक्षा के सुकून से सो नहीं पा रहा। निडर रहकर वह जी नहीं पा रहा, भय इतना कि पटाखा चलने या टी.व्ही. पर चलने वाली बहस को सुनकर सहर जाता, कब बलबा, कहां खूनी डकैती, चोरी, सड़क दुर्घटना हो जाये, कब किसकी नौकरी कब किसकी दुकान लुट जाये कौन सा हाकिम शासकीय अपराध से बचाने के एवज में मोटी रकम ऐठ ले जाये, कब किस गरीब से सेवा, या वस्तु खरीदी पर मोटी रकम ऐठ ली जाये, बढ़ते सड़क हादसे जगह-जगह होते अतिक्रमण, बात-बात पर हुड़दंग मारपीट बल्बा, बिजली, पानी, दूरसंचार, परिवहन में मजबूरी के चलते कानूनन अवैध बसूली हमारे महान लेाकतंत्र की वह उद्दंड औलादे बन चुनी है जिसने हमारे स्वर्ग से लेाकतांत्रिक परिवार को नरक बना अराजकता का अड्डा बना दिया है। 
दुर्भाग्य कि लेाग आज भी सच बोलने तैयार नहीं, चालाक, चापलूसों की संगठित मण्डलिया स्वयं को महिमा मण्डित  करने नये नये इतिहास रच रही है और देश, समाज की प्रतिभाओं को संगठित हो इन स्वार्थियों, धन लालचियों की व्यवस्था में वह बड़ी वैरहमी से कुचल रही है। 
मगर जो कुरुप चेहरा अब धीरे-धीरे हमारे प्रजातंत्र का सामने है उसके लिये प्रजा कम इसके स्वार्थी, लालची शासक ज्यादा दोषी है क्योंकि लेाकतंात्रिक रक्षा का समुचा संवैधानिक अधिकार इन्हीं में निहित है बेहतर हो नई शुरुआत हो, क्योंकि अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है। क्योंकि ये देश हमारा है यहां रहने वाले लेाग हमारे है जरुरत है, देश की जरुरते और लेागों भावनाओं को समझने की और यह तभी स भव है, जब राजनैतिक प्रशिक्षण की  संस्थाओं को जिन्दा कर उन्हें सुद्रण बनाया जाये।
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