प्रकृति का पैगाम है सन्तुलन

अगर भाजपा के वरिष्ठ नेता जेटली जी की माने तो वह महागठबन्धन की ताकत समझने में नाकाम रहे, वह नहीं समझ पाये कि क्या महागठबन्धन का वोट एक तरफ ट्रान्सफर हो सकता है। वहीं दूसरा तर्क यह भी है। भाजपा नेताओं की अर्नगल व्यानबाजी, चर्चा ये भी है कि आरक्षण पर आर.एस.एस. प्रमुख का व्यान भी हो सकता है वहीं पूर्व भाजपा नेता केन्द्रीय मंत्री अरुण शौरी का कहना है कि नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली की तिकड़ी है हार का कारण, वे यहां तक कहते है कि इस वक्त भाजपा सरकार का मतलब है ये तीनों नाम क्योंकि यहीं संगठन और सरकार चला रहे है। 

वहीं कुछ केन्द्रीय नेताओं का मानना है कि बिहारी बाबू के नाम से प्रसिद्ध शत्रुधन सिन्हा पर कड़ी कार्यवाही हो, तो वहीं बिहारी बाबू कहते है अगर मुझे मु यमंत्री का दावेदार चुनते तो चुनाव के नतीजे कुछ और होते। 
बहरहॉल सच यहीं है कि सारी ताकत झौकने के बावजूद भाजपा नेत़ृत्व वाला रा.ज.ग. बिहार में चुनाव हार गया और नीतीश के नेतृत्व वाला महागठबन्धन जीत गया। 

मगर एक कयास यह भी हो सकता है कि जब से आम मतदाता जागरुक हुआ है तब से उसके वोट देने के वक्त सोचने का नजरिया बदल गया है। 2014 के लोकसभा मेें मोदी नाम को देश की जनता ने जो बहुमत यूपीए सरकार की अकड़, अंहकार, भ्रष्टाचार के विरुद्ध देश के विकास के नाम पर दिया। क्योंकि देश के मुद्दे अलहदा और राज्यों पंचायत, नगर निगमो के मुद्दे अलग होते है और वोट देने व वोट लेने का तरीका अलहदा होता है। मगर जिस मेादी नाम को सबका साथ, सबका विकास के नाम वोट मिला, उस नाम को राज्यों के चुनावों में धकेल दिया। दिल्ली में करारी हार के बावजूद भी भाजपा ने सबक नहीं लिये। वहीं अंहकार चाहे दिल्ली के मामले में केजरीवाल को लेकर हो या फिर विदेश मंत्री सहित राजस्थान, म.प्र. के मु यमंत्री पर लगे ग भीर आरोप हो देश की जनता को फिर से चौराहे पर ला खड़ा किया और जनता फिर से खुद को ठगा सा महसूस करने लगी। जबकि आम बिहारी का वास्ता जितना बिहार से है उतना ही दिल्ली से भी है। और वहीं बिहारी दिल्ली की केन्द्र सरकार की अकड़ अंहकार आय दिन देख रहा था। उस पर नित नये मुद्दों को लेकर जनता के बीच भाजपा नेताओं के सवाल जबावों ने देश के सबसे पुराने शहर मगध और बुद्ध की भूमि को सोचने पर मजबूर कर दिया। वैसे भी कहा जाता है कि कड़ी मेहनत और थोड़े में सन्तुष्ट आम बिहारी बुद्धिजीवी ही नहीं समझदार और स्वाभिमानी होता है जो बिहार डॉ. लोहिया, जय प्रकाश नारायण, करपूरी ठाकुर की कार्यस्थली रहा हो, राजनैतिक तौर पर एक मजबूत लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के लिये कभी अगुआ रहा हो, वहां के लोग जुमले कहानी को छोड़ निश्चित ही परिणामों में विश्वास रखते है। 

जबकि जिस चेहरे को सामने रख, समुचा चुनाव लड़ा गया निश्चित ही 17 माह में वह एक भी परिणाम ऐसा नहीं दे सका जो बिहारियों को गले उतर पाता यहीं कारण हो सकता है बिहार में भाजपा की करारी हार हुई।

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