परिणाम विहीन राजनीति कहीं ले न डूबे लेाकतंत्र

कहते है आप निस्वार्थ भाव से अगर किसी भी सेवा में लिप्त है तो कोई कारण नहीं जो परिणाम आने से रोक सके। मगर परिणाम विहीन राजनीति ने हमारे महान लेाकतंत्र को एक ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया है जहां सतत सत्ता में बने रहने का स्वार्थ इतनी बड़ी बाधा खुशहाल भारत निर्माण में बन चुका है। कि क्या मूल्य क्या सिद्धान्त क्या हमारी पर परा, संस्कार सभी धीरे-धीरे बन्धक बन दिग्भ्रमित होते जा रहे है। 


काश सेवा का भाव भले ही क्षणिक होता, मगर परिणाम मूलक होता ताूे यह दिन तो आम भारतीय को न देखना होता, जिसे दे ा वह कलफ रहा है। चाहे वह देश का नेता, नौकरशाह उघोगपति, किसान, शिक्षक श्रमिक, सैनिक हो, हर वर्ग हो अपनो के ही हाथो अपनो से लुटना पढ़ रहा है। कभी डॉलर से अधिक मूल्य र ाने वाला रुपया आजादी के बाद 60 रुपये से ऊपर लुड़क रहा है। 

आखिर सोने की चिडिय़ा कहे जाने वाले भारत में ऐसा क्या घट रहा है जो, डॉलर के मुकाबले देश को 60 रुपये से अधिक का दाम चुकता करना पढ़ रहा है। 

कारण साफ है सतत सत्ता में बने रहने के स्वार्थ और मूल्य विहीन राजनीति ने हमें अंधा कर दिखा है जिसमें न तो आदर्श बचे, न ही सिद्धान्त, संस्कार , संस्कृति सच कहे तो इस दौरान ऐसा कचरा हुआ है कि अभिव्यक्ति अधिकारों के नाम लोगों ने हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की आड़ में अपनी-अपनी दुकाने जमा ली और इन्सानियत की आढ़ में मानवता डुबा दी जिसके परिणाम आज हम सभी के सामने है। 

महात्वकांक्षाओं के महाकुंभ में गोते लगाता समाज तो डूबने के कागार पर है ही, मगर सतत सत्ता का स्वार्थ रखने वाले भी कोई ज्यादा सुखी नहीं, क्योंकि समाज ही वह दरिया है जहां से लेाकतंत्र के हर स्त भ की सिंचाई हो, फसले बोई व काटी जाती है। 

महात्वकांक्षा ने समाज ही नहीं उस समूह और इन्सान जिससे समाज बनता है इस हद तक पागल कर रखा है कि हम मानव होने के बावजूद भी कई स्थानों पर अपने-अपने स्वार्थ महात्वकाक्षांओं के चलते हम जानवरों से गया गुजरा व्यवहार करते नजर आते है। अन्तर सिर्फ इतना है कि जानवरों ने आज भी अपने मूल्य सिद्धान्तों, संस्कारों से समझौता नहीं किया, मगर इन्सान ने मानवता के नाम महात्वकांक्षाओं की पूरी नुमाइस लगा रखी है। जहां से वह धनबान बन हर खुशिया खरदीना  चाहता है। कहते है अगर नोटो से खुशहाली नसीब होती तो सारे कुबेरपतियों की दुनिया अलग बस खुशहाल भारत में होती।
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