भीड़ तंत्र का समाजवाद

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज
भैया- मने तो काटो तो खून नहीं, काश मने भी कोई बड़ा शाही समाजवादी होता या फिर किसी धुर समाजवादियों के यहां पैदा होता, तो मने भी हाथों हाथ निर्विरोध सांसद, विधायक ही नहीं 9वी पास कर कैबीनेट मंत्री बन जाता, और लगे हाथों राष्ट्र व समाज सेवा में जुट जाता। मगर कै करुं मने हारे बुर्जुर्गो ने समझाया ही गलत। कि पढोगे लिखोगे तो बनोगे नबाव, खेलोगे कूदेगो तो बनोगे खराब, सो भाया इस जुमले की कहानी को देख हारी तो जवानी भी खराब हो ली। अब मने कै करुं, जो धुर समाजवादी बन जाऊं और सत्ता के सिंहासन पर बैठ हारे ही लेाकतंत्र को जीभ चिड़ाऊं। 

भैये- मुये चुप कर, वो तो भला हो थारे जैसे गांव के गरीब को जन्म देने वाले का, जो थारा जन्म हारे महान म.प्र. में हुआ। गर थारा जन्म गलती से भी यूपीए, बिहार में हुआ होता तो, थारी काठी का काम तमाम भी हमारे शाही समाजवाद में बड़े स मान से हो लिया होता। इतना बोलने पर तो थारी काठी उठ जाती, गर ऐसा न हो पाता तो, मने तो बोल्यू कम से कम थारी गिनती उन निशक्तजनों की भीड़ में अवश्य हो जाती। 
भैया- मने तो डॉ. लोहिया, जयप्रकाश नारायण, करपूरी ठाकुर और वर्तमान में जिन्दा रघु ठाकुर के समाजवाद की बात कर रहा हूं। किसी ठुमके वाले जलझे, या फिर जंगलराज वालो की बात थोड़े ही कर रहा हूं। सुना है हारे महान समाजवादी के जन्म दिन पर जलसा होने वाला है। वहीं जे.पी. के बिहार में अब समाजवाद नहीं परिवारबाद का डंका बजने वाला है। इधर हारे म.प्र. में भी पुस्तेनी जंग के मैदान में स्व. दिलीप की पुत्री और भाई कान्ति के बीच चली जंग का परिणाम आने वाला है। सुना है इस उपचुनाव  में वर्तमान व पूर्व सी.एम. की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है आखिर परिणाम किसके पक्ष में होगा हारे को चिन्ता बड़ी है गर कुछ पता हो तो, जरा विस्तार से बता, और अब हारे म.प्र. का भविष्य कै होगा हाथो हाथ पहले ही बता। 
भैये- तने तो बावला शै, कै थारे को मालूम कोणी, जब प्रतिष्ठा दांव पर हो तो रात काली हो जाती है। परिणाम जो भी हो, तने तो चुप ही रह, यही बात थारे को समझने वाली है। फिलहाल तो हारे भूपाल में देश के संत, विद्ववानों का सिंहस्थ को लेकर मंथन चल रहा है, दिशा क्या होगा इसी पर चिन्तन चल रहा है। वहीं भूपाल की सड़कों पर पुलिस के हाथों पिटे पंच परमेश्वरों का अखाड़ा रतलाम छोड़ अब दिल्ली की ओर चल पड़ा है।  
भैया- मने समझ लिया भाया यह तो भीड़ तंत्र की सवारी है आखिर हारे महान लेाकतंत्र से किसकी यारी है मने तो यह सवाल फिलहाल अधूरा लगता है, गर चल गया तो जादू, तो भूपाल कौन सा दूर लगता है भाया अब तो मने भी आज की राजनीति को समझने लगा हूं और खुद की छवि चमका स्वयंभू नेता बन, छवि चमकाने वाली क पनियों की तलाश में जुट गया हूं। गर मिला मौका तो मने भी चौपर में बैठ, मुंह फाड़ प्रवचन देने का अभियान चलाऊंगा, गर मिली कुर्सी तो उससे चिपक कुर्सी छुड़ाने वालो पसीने छुड़ाऊंगा। बोल भैया कैसी रही........... 
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