तोंतों के झुण्ड में अलाउद्दीन का चिराग

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज ?
भैया- अजीब है म्हारी भारत भूमि जिसकी अलग पहचान है तभी तो म्हारा भारत वर्ष महान है। सुना है तोंतो के हाथ अलाउद्दीन का चिराग पढ़ा है वहीं बिहार की पुण्य भूमि से गठबन्धन की जगह महा गठबन्धन प्रचण्ड बहुमत मिला है मने तो रह-रह कर कलेजा मुंह को आवे, आखिर कै होगा, हम गांव गरीब का।

भैये- थारा को, कै होने जाने वाला है जब थारे जैसे लोगों का आज तक कुछ न हो सका, तो अब कै होगा। मगर नीतिश बाबू बोले तो है, कि वह बगैर किसी भेद भाव के सबका विकास करेगें और लालू जी अब देश भर में लालटेन लेकर यात्रा करेगें। मने तो अफसोस है, कि म्हारे लेाहपुरुष अडवाणी जी के जन्म दिन पर एक बार फिर से लालू ने भाजपा का विजय रथ रोक है और बिहार की जनता ने देश की सरकार और विभिन्न राजनैतिक दलो को स्पष्ट अखण्ड भारत निर्माण का संदेश दिया है।
भैया- तो क्या तोता और अलाउद्दीन के चिराग की कहानी यहीं खत्म हो जायेगी या फिर तोंतो की मदद से अलाउद्दीन के चिराग से नईदुनिया बसाई जायेगी।
भैये- सबका साथ, सबका विकास सो समाज में तोंतो की भी जरुरत है और भाग्य चमकाने अलाउद्दीन के विराग की भी।
भैया- मने तो, काड़ू बोल्या कि भाई राजन से म्हारी महान एजेन्सी पूछताछ कर रही है, वहीं नीतिश बाबू को मोदी, ममता, उद्धव और न जाने किन-किन की जीत पर बधाई मिल रही है।
भैये- कै थारे को मालूम कोणी कि उगते सूरज को सभी सलाम करते है और उठती हाठ में गुणकारी सामान भी, ढेरी के भाव बिचते है।
भैया- तो क्या रतलाम, झाबुआ, देवास में अब महागठबन्धन का भूत भय फैलायेगा , त्रिस्तरीय पंचायती राज संगठन भी क्या भूपाल के दशहरा मैदान में बरसे ल_ो की कीमत चुकायेगा।
भैये- कहते है अंहकार तो बलसाली, बुद्धिमान रावण का भी नहीं रहा, भाई लेाग तो यहां तक कहने से नहीं चूकते ये तो प्रजातंत्र है और प्रजा तो भगवान राम की भी न हीं हुई। सो सत्ता सीनों को अंहकार कैसा ? ये तो वहीं जाने, त्रिस्तरीय पंचायती राज वालो से अब क्या सम्बन्ध बचे है, यह तो वहीं पहचाने।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा म्हारे महान दल की तो मगध में मिट्टी कुट ली, नीतिश बाबू की दीवाली शुभ, तो म्हारी अशुभ हो ली, मगर मने चिन्ता बिहार की कम, म्हारे म.प्र. के उपचुनावों की ज्यादा सता रही है, वहीं सुनते है पंचायती राज वालो की टोली रतलाम, झाबुआ में घूम-घूम कड़ी मेहनत कर पाई पाई चुका रही है।
बेहतर होता कि तोंतो को समय रहते अलाउद्दीन के चिराग की कहानी समझ आ जाती, तो भाया ऐसी दुर्गति म्हारे महान दल की न होती, अभी तो रतलाम, झाबुआ, देवास में घमासान है अब यह तो चुनाव परिणाम ही तय करेगें किस पर कितना सामान और सत्ता बचाये रखने का इन्तजाम है।
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