दमन का धिक्कार दिवस...?

तीरंदाज 
भैया- अब मने तो भूपाल न जाऊं, भाया लिखा तो ये था झीलो के शहर में आपका स्वागत है मगर हारे को कै मालूम कि ल_ों लात घूूसों  से झीलों के शहर में दौड़ा-दौड़ा कर स्वागत होवे। भाया कै दौड़ा-दौड़ा कर ठोका है, जगह-जगह ल_ की दम पर पंच परमेश्वरों को रोका है। बर्फ भरी सर्दी में भी पीठ पर बिजली चमक ली। भाया कै भूपाल में इमरजेन्सी लगी थी, जो हारे जैसे चुने हुये प्रतिनिधि की ऐसी दुर्गति हुई है। मने तो बोल्यू भाया बड़ी ही बैरहमी से हारी भगवा सरकार की खाकी ने हम पंच परमेश्वरों को दौड़ा-दौड़ कर पीटा है मगर कुटे पिटे एक भी किसान ने हारे मु यमंत्री से एक शब्द भी विवेद भारती पर फोन कर नहीं बोला है।

मगर भाया मने एक बात गले न उतरी कि आखिर क्या हारे गांव का पंच परमेश्वर, अधिकारी, नेता, उघोगपति बन लिया है जो उसका नाम किसानों की लिस्ट से कट लिया है। जो हारे मुखिया को भूपाल में रेलम पेल मचाये किसानों की फौज पंच परमेश्वरों के रुप में न दिखी जो हाथों हाथ रेडियों पर हारे मुखिया को मन की बात हारे किसानों से कहनी पड़ी।
भैये- चुपकर बावले कै थारे ने गांव के गरीब किसान अर्थात पंच परमेश्वरों का हाल नहीं देखा है जो संवैधानिक अधिकारों की मांग करने हजारों की सं या में भूपाल पहुंचे थे। कै उन चौंगा ल_ुओं वालो का व्यवहार नहीं देखा है जो मलाई में घप लोकतंत्र के स्त भ के नाम दुकाने चला, सरेयाम कुटते पंच परमेश्वरों को छोड़ दिन भर रेडियो पर मन की बात का राग देर रात तक छेड़ा है। हो कुछ रहा है, दिखा कुछ रहे है। भूपाल में लट्ट चला और वह रेडियों सुनवा रहे है।
भैया- तो क्या हारे राजा भोज के भूपाल में अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई बन्दिस लगी है जो सारी जमात बोलने के बजाये चुप खड़ी है। खाकी के कहर से कशमसाये, पंच परमेश्वरों के नेताओं से सुना है कि वह दमन के विरोध में स्थापना दिवस को धिक्कार दिवस के रुप में मनायेगें, आखिर सच क्या है ?
भैये- मने तो बोल्यू भैये चुप कर, गर सुन लिया किसी ने तो सांड, शेरो की इस लड़ाई थारी तो थारी हारी मिट्टी भी कुट जायेगी फिर थारे को भी अंग्रेजों के जमाने की याद ओछी नजर आयेगी।
भैया- बात तो थारी सौ आने सच मगर कै करुं मने भी सरकार बनाने अर्स से लेकर फर्स बिछाने तक का काम इन केडर वालो के कहने पर वर्षो तक किया था घर के चने खाकर इस पार्टी को बड़ी मेहनत से खड़ा किया था। फिर मोदी जी ने भी तो कहा था कि अच्छे दिन आने वाले है। कै अच्छे दिनों का आगाज ल_, लात, घूसा ही है जो हारे जैसे किसान ने भूपाल की सड़को पर भोगा है।  काठी टूटे उन आन्दोलन कारियों की, जो मने रेडियो पर भी मुखिया जी से नहीं बतिया पाया। मगर मने एक बात जरुर कहना चाहूं कि भाया जो कुछ जनसेवा के नाम हारे लेाकतंत्र में चल रहा है। जिस तरह का गठबन्धन लेाकतंत्र के 2 घोषित 1 अघोषित स्त भो के बीच बन गया है। उसे देखकर नहीं लगता कि अब कभी अच्छे दिन आने वाले है क्योंकि जैसे ही जुबान खोली समझों ल_, लात, घूसे हारी काठी पर चलने वाले है।
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