प्रमाणिकता का अभाव और बढ़ती अराजकता

व्ही.एस.भुल्ले
माननीयों के आश्वासन और श्रीमानों की टरकाऊ शैली ने हटो बचों के चलते बने फॉरमूले ने देश ही नहीं प्रदेशों में अविश्वास की खाई लेागों के बीच इतनी गहरी कर दी है कि चहुं ओर दिन दूनी रफतार से लोगों के मन में पनपती अराजकता ने पैर पसारना शुरु कर दिया है। 

परिणाम जरा-जरा सी बात पर तोड़ फोड़ आगजनी मार पीट अब तो लेाग हत्या करने तक से नहीं चूकते, मगर यहां यक्ष प्रश्र यह है कि देश प्रदेशों में कानून की मोटी-मोटी किताबें है, सरकारे है और इन कानून की किताबों में भरे पड़े कानूनों का पालन कराने वाली संस्थायें और संगठन भी। फिर भी भाई लेाग खुलेयाम कानून को मजाक बना मनमर्जी करने पर उतारु हो जाते है। 
चाहे वह संवैधानिपक संस्थायें हो या फिर अक्षरश: संविधान को स्वीकारने वाले लेाग तो फिर खामी कहां ? 
मगर दुर्भाग्य कि सतत सत्ता में बने रहने सत्ता के रथ में सबार सत्तासीनों, दलो या फिर सरकारों की गलत नीतियों का विरोध न करने वाले दल, तथा सत्ताधारी दलो के इशारों पर काम करने वाला मीडिया सभी सतत सत्ता में बने रहे मलाई फाकने के मिशन पर है तभी तो मीडिया को गरीब की आह और किसी गली में किसी बैवस की चीख सुनाई नहीं देती और सरकार में बैठे लेागों को भाषण स्वागत उदघाटन, समापन से फुरसत कहा, जो गांव गरीब के घर में झाक उनकी बैवसी भरी बेहरम जिन्दगी को देखे। फिर श्रीमानों को भी क्या पढ़ी है कि वह भी सत्तासीनों की मंशा से इतर कुछ कर सके। उन्हें भी मुगालता यह है कि वह तो 60 साल की उम्र तक शासन में है तो बढिय़ा सुख सुविधाओं और मोटे वेतन भत्तों के सहारे उनकी भी सुख सुविधाओं के बीच 60 वर्ष की उम्र पूरी हो जायेगी। 
अगर कायास ठीक है तो इस देश ही नहीं प्रदेशों में बढ़ती अराजकता को शायद ही कोई रोक पाये, दूसरा कारण अब सरकारों का फण्डा भी लोक कल्याणकारी न होकर मुनाफे का बनता जा रहा है चाहें फिर वह बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य हो या फिर सुरक्षा और यह भी सुनिश्चित नहीं कि यह सुविधायें भी पूरी कीमत चुकाने के बाद सहर्ष नसीब हो पायेगीं। कहने का तात्पर्य, ग्लोबलाइइजेशन के दौर में संवेदनायें जब बिजनेस बन गई हो और इन्सानी समझ की जगह छवि चमकाने वाली क पनियों और संवाद की जगह इलेक्ट्रॉनिक मशीनों ने ले ली हो तो, ऐसे में संवेदनाओं की उ मीद बैमानी है। 
मगर देश के लिये अनगिनत कुर्बानियों की दरकार है कि देश के दल, सरकारे श्रीमान, मीडिया, समाज सेवी, धार्मिक गुरु सभी एक जुट हो कुदरत द्वारा निजात इस सुन्दर कायानात को बचाने अविल ब पहले करे। बरना कहीं बहुत देर न हो जाये, जिससे आने वाली नस्ल को बताने हमारे पास न तो कोई दलील होगी और न ही चमकी छवि पर सिवाय कोसने के सराहना कर तालियाँ बजाने वालो की फौज, फैसला अब हम देश वासियों को करना है कि हमें अब क्या करना चाहिए।  
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