श्राद्ध पक्ष की श्रद्धाजंली, स्वराज: जंग जरुरी

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज
भैया- कै करु, मने तो कोई सुनने वाला ही नहीं सो 2 अक्टटूबर को महात्मा गांधी के चरण छू स्वराज आन्दोलन का आगाज कर स्वयं भू- बन, साथियों के सहयोग, सलाह पर सयोजक बन रहा हूं और हारे महान भारत में एक नये युग की शुरुआत कर रहा हूं। क्योकि भाया पीढ़ा मुझे ही नहीं मेरे जैसे लाखों करोड़ों इन्सानों की है जिसमें सबसे बड़ी मेहरबानी हारे माननीय और श्रीमानों की है जो लेाकतंत्र के नाम हारे पूर्ण स्वराज को दफन करने पर तुले है और अब तो भाया हम गांव, गरीब, गली वालो का जिन्दा रहना मुहाल किये है।

भैये- अब हारे महान लेाकतंत्र और माननीय की सेवा व श्रीमानों के सत्कार में ऐसा क्या हुआ है कै थारे को हारे महान लेाकतंत्र में लेाकशाही का केन्द्र, राज्य व त्रिस्तरीय पंचायती राज तथा गली मोहल्लों में नगर निकाय राज नहीं दिख रहा जो तू स्वराज की लड़ाई स्वयं भू संयोजक बन लडऩे चला है।
थैया- कै थारी, थरे से फूटी है जो थारे को हारे महान लेाकतंत्र में लेाकशाही को अघोषित तौर पर कुचल कहीं फासिटबाद  तो कहीं परिवार, सामंत, साम्राज्यवाद पनप रहा है। बैचारा गरीब ही नहीं अब तो मध्यम परिवार और खाता पीता परिवार भी कलफ रहा है।
भैये- तने तो बावला शै थारे को मालूम कोणी केन्द्र, राज्य, नगर पंचायतों में जनता द्वारा चुने हुये प्रतिनिधियों का ही राज्य तथा शासन चल रहा है और देश में लेाकशाही का वटवृक्ष खूब फल फूल रहा है।
भैया- थारे जैसे मीडिया वालो की यहीं तो खराबी है कै सरपटे के पेड़ को, तने वटवृक्ष बोल समझ रहा है और भरी दोपहर में आसमान को देख तारे गिनने की सोच रहा है। भाया माल में घपे थारे जैसे मीडिया वालो का, कै जो हारे जैसे गांव,गली गरीब की पीढ़ा को राम राज बोल रिया शै, सच बोल्यू तो भाया यह घाव किसी और का नहीं, हारे अपने माननीय श्रीमानों ने दिया है। अगर अकेले श्रीमानों के दिये घाव होते तो माननीयों को पुकारने भर से भर जाते। मगर यह घाव तो श्रीमानों की शह पर माननीयो ने ही दिया है न तो यह लेाकशाही हम गांव गली, गरीब को निगलते बन रही न ही उगलते। अब भाया मने तो एक ही रास्ता बचता है कि स्वयं भू संयोजक बन स्वराज के लिये लड़ जाऊं और जीवन का अन्तिम लक्ष्य पूर्ण स्वराज को ही बनाऊं , क्योंकि मने भूला नहीं हूं हारे बुजुर्गो की वह कहानी जिसमें भगवान राम-लक्ष्मण के तालाब में स्थान का उल्लेख है कि एक मर्तवा भगवान राम-लक्ष्मण किसी तालाब किनारे अपने तीर छिपा स्नान करने चले गये, स्नान पश्चात लौट उन्होंने जैसे ही तीर उठाये उसमें रक्त लगा हुआ था। यह देख लक्ष्मण भगवान राम से बोले भैया हमसे अनजाने में हिंसा हुई है यह सुन भगवान राम जब उस स्थान पर पहुंचे और उन्होंने घायल मैढक से पूछा कि सांप तु हें पकड़ता है तब तो तुम जोर-जोर से चिल्लाते हो, मगर आज तुम बगैर शौर किये ही चुप क्यों हो ? इस पर मेढक बोला प्रभु जब सांप पकड़ता था तो हमें आपसे आशा रहती थी कि हमें बचा लेगें और प्राणों की रक्षा करेगें। मगर प्रभु जब आप ही की वाण हमें चुभे हो तो फिर किसको पुकारते सो चुप रहे। मैं तो बोल्यू भाया मने शिकायत हारे श्रीमानों से नहीं, माननीयों से है जो हमारी जान ही नहीं मान, स मान, स्वाभिमान की रक्षा में अक्षम साबित हो स्वयं ही हमारी पीढ़ा का सबसे बड़ा कारक बन गये है सो हारे जैसे कई साथी अब पूर्ण स्वराज के लिये निकल लड़ रहे है।
भैये- मुये चुपकर ये आन्दोलन बान्दोलन की बाते गर किसी माननीय श्रीमान ने सुन लिया तो थारी हालत भी राजा भोज की नगरी भूपाल में जुटे अध्यापक और भगवान भोलेनाथ के शहर वारणासी में जुटे बाबा साधुओं की तरह हो जायेगी। दिल्ली के धरने पर बैठे बाबा को तो मुंह छिपा भागने सलबार सूट मिल गया था थारे जैसे गांव, गरीब, गली को धोती सलवार तो दूर की कोणी लगोंटी तक भी नहीं मिल पायेगी और बैजह ही हारे महान लेाकतंत्र की महान मीडिया दिन रात ब्रेकिंग न्यूज चलायेगी। और देखते ही देखते थारी फोटो अखबार वालो के लिये लीड खबर बन जायेगी।
भैया- मने जाड़ू मगर हारी बात भी तने कान खोलकर सुन ले गर गरीब की धोती नहीं, लगोंटी भी जाती रही, तो क्या आफत आ जायेगी ? खेत पर फांसी या आत्महत्या से तो बेहतर है, स्वराज के लिये हारी काठी भी टूटी तो मरते वक्त हारे मन में कोई गिलानी नहीं रह जायेगी। भले ही हारी गिनती शहीदों में न हो कम से कम इन्सानी मौत तो कहलायेगी, और हारे सैकड़ों शहीद देश भक्त ही नहीं, महात्मा गांधी पण्डित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. लोहिया को ये हारी सच्ची श्रद्धाजंली हो जायेगी।
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