म.प्र. कॉग्रेस: क्या कमान होगी, कमलनाथ के हाथ ?

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाईम्स, 10 अक्टूबर 2015- म.प्र. भोपाल विगत वर्षो से बैवजह या फिर षडय़ंत्र पूर्ण तरीके से मुंह की खाती आ रही कॉग्रेस आसन्न उपचुनाव और अभी से चौथी पारी की तैयारी में जुट चुकी भाजपा सरकार के मिशन 2018 को रोक पायेगी कहना जल्दबाजी होगी।

मगर जैसी कि म.प्र. और दिल्ली के गलियारों में म.प्र. के कॉग्रेस संगठन को लेकर चर्चा है उसके मद्देनजर यह कयास प्रबल दिखाई देते है कि जल्द ही कमलनाथ जैसे वरिष्ठ राजनीति के मजे खिलाड़ी को कॉग्रेस आलाकमान म.प्र. की कमान सौंप सकता है। क्योंकि म.प्र. में धड़े में बटी कॉग्रेस में जितने भी प्रयोग नये अध्यक्षों को बना कर किये गये वह न काफी रहे। चाहें कान्ति लाल भूरिया के रुप में रहे हो या फिर अरुण यादव के रुप में हालाकि जिस तरह से तमाम हीला हवाली और असफलता के चलते गत दिनों कॉग्रेस कमेटी गठन का निर्णय तो साहसिक था। मगर उनके अधूरे राजनैतिक अनुभव और अति उत्साह ने उन्हें अक्षम साबित करने का काम किया।

जिस साहस का परिचय देते हुये उन्होंने कॉग्रेस कमेटी का गठन किया। अगर उतने ही सदाचार के साथ वह प्रदेश भर का दौरा कर वरिष्ठ कॉग्रेस नेताओं की भावनायें उनके सहयोग से संगठन और सत्ता पक्ष को घेरने का कार्य करते तो वह एक सफल अध्यक्ष साबित हो सकते थे।
हालाकि अरुण यादव को यह कार्य करना इतना आसान नहीं था क्योंकि कॉग्रेस में धन,बल बाहुबल, जनबल के ताकतबर गुट उन्हें कभी भी पार घाट नहीं लगने देता। भले ही उन्हें अन्य गुटो में सफलता की स भावना थी और यहीं कारण है कि शायद उन्हें जाना पढ़े और कमलनाथ को म.प्र. आना पढ़े।

अगर कमान कमलनाथ को मिलती है तो उनके साथ प्लस पॉइन्ट यहीं कि वह एक तो म.प्र. की राजनीति मेें वरिष्ठ नेता ही नहीं 10 जनपद के खास होने के साथ ही महाकौशल, मालवा, बुन्देलखण्ड, च बल जैसे क्षेत्रों में खासी पकड़ रखते है। दूसरा सबसे बड़ा कारण पार्टी चलाने वह आर्थिक रुप से सक्षम भी है। तीसरा महत्वपूर्ण कारण वह स्व. अर्जुन सिंह के समय से म.प्र. की राजनीति में बड़ा दखल रखने वाले सक्षम नेता है। एक समय था कि पूर्व मु यमंत्री दिग्विजय सिंह को भी उनका सरंक्षण सहयोग प्राप्त था जो गुट आज म.प्र. में धन व जनाधार के मामले में सबसे आगे है।

मगर दिग्विजय के केन्द्र में सक्रिय रहने और इस गुट पर गाहें वगाहें सत्ताधारी दल को औपचारिक अनौपचारिक सहयोग के आरोप प्रत्यारोप लगते रहे है। शायद यहीं कारण रहा कि कॉग्रेस मजबूत होने बजाये रसा तल में जाती रही। शायद इसी कमी को भांप अरुण यादव ने इकेला चलो का नारा बुलन्द किया और परिणाम की उन्हें कॉग्रेस अध्यक्ष पद से हाथ धोना पढ़ सकता है।

बहरहॉल कमलनाथ के साथ एक प्रबल पक्ष यह भी है कि वह जितने बड़े, सक्षम, म.प्र. में कॉग्रेस के वह नेता है उसके चलते उन पर उंगली उठाने वाले या उनके निर्णयों को अस्थिर करने वालो को अब कई बार सोचना पढ़ेगा।

मगर म.प्र. में मौजूद धड़ों को एक धागे में पिरोने की दरकार तो उनके सामने भी होगी। वहीं रतलाम, झाबुआ, देवास, मेहर उपचुनावों का दबाव और भाजपा के मिशन 2018 की हवा निकालने का लक्ष्य भी। देखना होगा कि अगर कमलनाथ को कमान मिली तो वह क्या रणनीति बनाते है।

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