मार्केटिंग के मायाजाल में दम तोड़ती जनाकांक्षा

विलेज टाईम्स, सितम्बर 2015। कलफते लेागों की पीढ़ा यह है कि न तो उन्हें सहज नैसर्गिक सुविधायें नसीब हो पा रही, न ही जनाकांक्षाओं की पूर्ति हो पा रही। व्यवस्था के मुखिया है जो मार्केटिंग के मायाजाल में उलझ सतत सत्ता में बने रहने के गुरुर में न तो कुछ देखने तैयार है। न ही कुछ सुनने मायूस बैवस लेाग असहनीय पीढ़ा से गुजर उस दिन को कोस रहे है। जब से उन्हें संकटों ने घेरना शुरु किया।


मगर इस सब बीच सबसे बड़ा यक्ष सवाल यह है कि पैसा लेकर सेवा देने वाली संस्थाओं को तो कड़ा कानूनी संरक्षण है। मगर आम नागरिक का सरंक्षण उसके हको का संरक्षण करने कोई कारगार कानून नहीं। मसलन अगर पुलिस झूठे कैसे में फसा जेल की हवा खिलवा दें। अगर वह व्यक्ति अपने प्रयासों निर्दोश साबित हो जाये तो वह तो छूट आता है। मगर झूठा फसाने वाले का कुछ नहीं हो पाता।

इसी तरह बिजली क पनियाँ अनाप सनाप बिल सीधे साधे लोगों पर ठोक जेल भिजवा रही है। तो किसी किसी व्यक्ति को तो निर्दोष होने के बावजूद जमानत तक नहीं मिल पा रही है। ऐसा ही हाल दूरसंचार निगम का है। नेट आये न आये, टेलीफोन चालू हो या फिर बन्द मगर बिल बराबर आता है। क्योंकि बिल क प्यूटराइज और पूछने वाले को कोई  जबाव नहीं, क्योंकि बनाने वाला कोई और बिल थमाने वाला कोई और होता है इन निगम क पनियों में।

रहा सवाल सड़कों का तो रोड़ टेक्स पूरा मगर रोड कब बनेगी, या बस गड्डेांं में ही चलेगी गड्डों से पटी सड़क कब बनेगी बताने वाला  कोई नहीं।

मगर मुखियाओं को स्वयं की मार्केटिंग से ही फुरसत कहा, सारे विश्व को समेट लेने का सपना तो सिकन्दर ने भी देखा था क्या पूरा हो सका। जबाव जरुर मिल जायेगा मगर भाई लेागों को यह सच समझने की फुरसत कहां। समझ गये तो ठीक बरना इतिहास तो वर्तमान के इन्तजार में है ही भविष्य क्या होगा, इन मुखियाओं का फिलहॉल यह गर्भ में है। 
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