आफत में अन्नदाता, आत्महत्या पर मजबूर, 3 ने दी जान, 2 अस्पताल में

विलेट टाई स, 8 अक्टूबर 2015- म.प्र. भोपाल समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों की माने तो सरकार ने माना है कि कि पिछले 8 महिने 11 न बर 2014 से 30 जून 2015 तक 754 किसानों ने आत्महत्या की वहीं गैर सरकारी संगठन का दावा है कि म.प्र. में 1 वर्ष के दौरान लगभग 2200 किसानों ने आत्महत्या की।
वहीं 30 जून 2015 को विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार म.प्र. के खरगौन में 38, बड़वानी 37, छपरपुर 30, भिण्ड 27, जबलपुर 26, सागर 24, शिवपुरी 23, सतना 18, रीवा जिले में 17 आत्महत्या के मामले सामने आये, मगर हाल ही में बरबाद हुई सोयाबीन और उड़द सहित अन्य फसलों की बरबादी पर आष्ठा  मैना के निवासी जीवन सिंह ने फांसी रीवा गौर गांव के तमरोदेश निवासी अवध लाल पटेल की अटेक से मौत हो गई व सागर के चनौआ गांव के सीताराम कुर्मी ने जहर खा कर जान देने के कोशिस की। वहीं खंडवा के दो किसानों ने भी जान देने की कोशिस की वहीं पिपलौद के अंबापाठ गांव के रामचन्द्र जावले ने जान दे दी।
अब जबकि प्राकृतिक आपदा के चलते प्रदेश में अन्नदाताओं द्वारा की जा रही आत्महत्याओं का दौर नहीं थम रहा है। ऐसे में क्या अल्प वर्षा से बर्बाद किसान को फसल कटाई सर्वे या फिर फसल बीमा सहित कर्ज न बसूली का आश्वासन काम कर पायेगा। जबकि कई बर्बाद किसान खेत जोत चुके है तो कई सर्वे के इन्तजार में अपनी बर्बादी का मंजर रोज देख रहे है।
ऐसे में सरकार की तरफ से मिलने वाले आश्वासन और आधी अधूरी बीमा योजना क्या भला कर पायेगी कहना मुश्किल जिसमें मनरेगा से लेकर बी.आर.जी.एफ. जैसे कई योजनाओं में पैसा ने होने के चलते हालात बैकाबू हो सकते है। बेहतर हो सरकार धरातल पर आ व्यवस्था में जुट जाये और राहत रोजगार बना उन्मुख कार्य शुरु कराये नहीं तो हालात बद से बत्तर होते देर न होगी। तब सरकार के पास न तो कोई दलील होगी और न ही कोई राहत जिससे आत्महत्या करते अन्नदाताओं को रोका जा सकता है। 
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