कॉरपोरेट कल्चर में लोकतंत्र का कबाड़ा,न सेवा रही,न संवदेनशीलता

व्ही.एस.भुल्ले। विलेज टाईम्स, अगस्त 2015। विगत वर्षो से राजनीति में पनपे कॉरपोरेट कल्चर ने लेाकतंत्र का कबाड़ा कर डाला। अब न तो सेवा बच...

व्ही.एस.भुल्ले। विलेज टाईम्स, अगस्त 2015। विगत वर्षो से राजनीति में पनपे कॉरपोरेट कल्चर ने लेाकतंत्र का कबाड़ा कर डाला। अब न तो सेवा बची न ही संवेदनशीलता चहुं ओर लेाकतंत्र के नाम स्वार्थो की लूटमार मची है। हाइटेक होते देश में संवेदनशीलता की बैवसी और सेवा की चीथ पुकार अब इन्सानियत को भी नहीं बख्श रही है।

सामूहिक जबावदेही के नाम चमकते मुखोटो की हकीकत ने साबित कर दिया कि अब राजनीति सेवा को छोड़ स्वार्थ साधने का माध्यम बन गई है। जहां संवेदनाओं का कोई स्थान नहीं।

अपुष्ट सूूत्रों की माने तो राजनीति में आज चेहरे कोई और रणनीति कोई कर रहा है तो कई चेहरे चमकाने वालो की सार्गिदी कर स्वयं के चेहरे चमकाने की कोशिस कर रहा है।  ऐसे में सेवा, संवेदनशीलता की उ मीद करना अब बैमानी है।
आज बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट ब्रान्ड की तरह करोड़ों, अरबों के ठेको पर छवि चमकाई जा रही है। जिसकी आड़ में सत्ता माल कमाने कॉरपोरेट पैटर्न पर सरकार ही नहीं दलो के अन्दर राजनीति चमकाई जा रही है। जिनका मकसद माल बना, सतत सत्ता में बने रह माल झपक सेवा करना है।
एक समय था दलो का अपना काम था नेतृत्व का भी एक स मान था क्योंकि उसके अन्दर सेवा, भाव, संवेदनशीलता कूट-कूट कर होती थी। जिनका अन्तिम लक्ष्य जनभावना अनुरुप उनकी आकांक्षापूर्ति और सेवा भाव था।
संवदेनशीलता ऐसी कि वह आम कार्य कत्र्ता ही नहीं, आम लोगों के बीच अपनी स्थति अनुसार संवाद कायम रख उनके प्रति संवेदनशीलता रख स मान प्राप्त करती थी और एक जनाधार वाले नेता के निर्माण में राजनीति को मदद करती थी।
मगर आज लगभग जितने भी दल सत्ता में है उनमें हाईटेक हो, उनके अन्दर कॉरपोरेट कल्चर सिर चढ़ कर बोल रहा है। बैवस जनता डकरा रही है। मगर वोटो की बैवसी इन सत्तासीनो के कॉरपोरेट कल्चर के चलते निढाल बन, लोगों को नारकीय जीवन जीने के लिये मजबूर बना रही है। आखिर कहां जाये ये मजबूर लोग।
क्योंकि कॉरपोरेट कल्चर में व्यवस्था जो भी हो, जिनका अन्तिम लक्ष्य अधिकाधिक मुनाफा कमा क पनी को मजबूत और समृद्धशाली बनाना होता है, न कि जनसेवा करना।
हमारे महान लेाकतंत्र में अब तो हालात ये है कि जिन सरकारी संगठनों की स्थापना जनसेवा व जनकल्याण हेतु  की गई थी और जिनका कत्र्तव्य संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों की सुरक्षा करना था, मगर आज वह अपने नफा नुकसान के आधार पर चलाये जा रहे है, चाहे नैसर्गिक सुविधा, शिक्षा, सुरक्षा, सड़क, सेवा हो या फिर स्वस्थ रह स्वच्छ जीवन जीने का आधार हर क्षेत्र में मुनाफे की होड़ मची है। धन लालची, स्वार्थो के चलते इन्सानियत को सरेयाम नीलाम कर इन्सानियत को तार-तार कर रहे है।
मगर वोटो के लिये बैवस हमारे दल और नेताओं को आम व्यक्ति का कलफना नहीं दिख रहा है क्योंकि उन्हें मुगालता है जीत और छवि चमकाने वाली भाड़े के एजेन्सी तथा धन और बाहूबल पर, मगर वह भूल रहे है कि यह देश सेवा और संवेदनशीलता से भरा पड़ा है। इतिहास गबाह और वर्तमान सामने अगर कुछ जि मेदार लेाग गलत फहमी में है, तो उन्हें सोचना होगा सच क्या है बरना भविष्य तो इन्तजार में है ही।

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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Village Times: कॉरपोरेट कल्चर में लोकतंत्र का कबाड़ा,न सेवा रही,न संवदेनशीलता
कॉरपोरेट कल्चर में लोकतंत्र का कबाड़ा,न सेवा रही,न संवदेनशीलता
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