मुगल, फिरंगियों को भी पीछे छोड़ा, माई बाप

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज
भैया- माई बाप ऐसी लूट की मुगल, फिरंगी भी फीके पढ़ रहे है, हारे को कै मालूम था कि लेाकशाही में भी ऐसी लूट होती है, आम गांव, गरीब, किसान कराह रहा है। मगर हारा दर्द सुनने मुआ एक भी नहीं आ रहा है आखिर किस भरे में जा गिरु, अब तो बादल भी दगा दे रहे है न जाने किस मुगालते में हम गरीबों के खेतों में खुलकर नहीं बरस रहे है। मैं तो बोल्यू भाया हारी खून पसीने से उगाई फसल पर इल्ली, कीट, पतंगों की खुलेयाम दावत चल रही है और हारे माई बापों की निगाह हम गरीबों पर क्यों नहीं पड़ रहे है। खेत-खेत बीमारी जनत जीवाणुओं के भण्डारे उड़ रहे है मातम मनाते हम गरीब खुलेयाम डकरा रहे है मगर राहत में दूर की कोणी, ढांढस बधाने वाले भी तो दूर-दूर तक नहीं दिख रहे है, आखिर कैं करु भाया।

ौये- सबसे पहले तो हारे को तू ये हाथों हाथ बता कि मुगल, फिरंगियों का जमाना तने क्यों याद आया, कै थारे थरे से फूटी है जो थारे को हारे माननीय और श्रीमान नहीं दिखते, जो दिन रात थारे जैसे, गांव, गरीब के कल्याण में जुटे रहते है। उडऩ खटोलो पर उड़ते माननीय और लग्झरी कारों में सर्राटे भरते हारे श्रीमान नहीं दिखते है जिन्दे में आये मरे में ढांडस बधायें, हर 5 वर्ष में होने वाले चुनावों के महाकुंभ में खुलकर मान मनोबल कर सदा व्रत बटवाये और तुझे मुगल फिरंगियों की याद आ रही है लगता है थारी बारी भी हारे अध्यापकों की तरह आने वाली है, थारे जैसे गांव गरीब की आवाज भूपाल में गर गूंजी तो समझ थारी भी मर मत हारे अध्यापकों की तरह होने वाली है।
भैया- तो कै मने कुछ गलत बोल दिया, जो हारा दर्द सुनने के बजाये तने भी हारे माननीयों की तरह पूरा का पूरा भाषण पैल दिया। भाया फिलहॉल तो हारी फसल सूख रही है कभी पानी तो कभी ओलो की बक्र दृष्टि हारे जैसे गांव, गरीब के खेतों में पड़ रही है।
अगर कुछ वर्ष और यहीं हाल रहा तो पक्का समझना भाया, बगैर फांसी के ही हारी तो दम निकल जायेगी मगर ंमने न लागे कि मुआवजा देने वालो की मण्डली हारे अपनो तक भी पहुंच मुआवजा देते वक्त मुगल फिरंगियों को पीछे छोड़ रहम कर हारे अपनों पर भी रहम खायेगी, मने तो लागे माई बापों आपके मातहतों की पठानी बसूली अवश्य आढ़े आयेगी।
भैये- तू हारे को वृतान्त न सुना मने तो तू मुगल फिरंगियों की कहानी बता।
भैया- गर सुनना चाहे तो तने सुन, बगैर रिश्वत दिये अब तो दम भी नहीं निकल रहा, पैदा होना तो दूर की कोणी जिन्दा रहने तक का दाम दर-दर देना पड़ रहा है। पहले तो ााया लगान ही बसूला जाता था अब तो देश में दौरे पठानी बसूली चल रहा है जिसमें अब न तो कोई नायब न ही अहलंकार है हमारी सरकारों का हर मुलाजिम अब तो सामंत जागीरदार जमीदार बन बसूली कर रहा है। भले ही देश में लेाकशाही हो, मगर लेाकतंत्र के हम शाहों की जैसी दुर्गति हारे लेाकतंत्र में हो रही है। सदरी तो दूर कोणी चिन्दी तक नहीं छोड़ी जा रही है और मातहतों की फौज मची लूट में जमकर मौज उड़ा रही है।
भैये- तने तो बावला शै बड़े-बड़े सेवक माननीयों को चोला उतार थारे जैसे गांव गरीब की सेवा में जुटे है। अपना पूर्व वर्तमान चमका भविष्य उज्जवल करने में लगे है और तू है जो अर्र-बर्र बके जा रहा है, कै थारे को हारा महान लोकतंत्र नजर नहीं आ रहा है।
भैया- मैं जाड़ू थारे जैसे चित्रकार पत्रकारों को जो मालिकों की मिट्टी को भस्म के भाव बीच चौराहों पर बैच रहे हो, स्वच्छन्द वातावरण के नाम भस्म के रुप में मिट्टी तौल रहे है, मगर कत्र्तव्य निभाने के बजाये हम गरीबों के मजे लूट रहे हो, मगर कहते है कि पैसा बहुत कुछ होता है मगर सब कुछ नहीं, भाया हारी तो जैसे भी हो कट जायेगी मगर आने वाली नस्ल इन माननीय, माई बापो को कभी माफ नहीं कर पायेगी।
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