जीवोत्पार्जन तो सभी करते है मगर सेवा सबसे बड़ा कार्य: डॉ. रत्नेश जैन

विजेज टाईम्स, 23 सितम्बर 2015। सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक लोगों की पीढ़ा में स मलित हो, उनके सार्थी बन सहयोग करने वालो डॉ. रत्नेश जैन यंू तो शासकीय चिकित्सक के रुप में लगभग दो दशकों से निर्विवाद सेवाये म.प्र. के शिवपुरी जिले में दे रहे है। 

मगर मसोस भरी गर्मी में बीमारियों से घिरे मरीजों के बीच चिकित्सालय ही नहीं स्वयं के निवास पर भी सेवा देने में जुटे रहते हैं। कम बात करने व हसमुख मिजाज डॉ. रत्नेश जैन कभी झुझलाहट या विचलित नहीं होते मेडीसिन के क्षेत्र में याति प्राप्त इस डॉक्टर की कार्यशैली देखते ही बनती है। 
पैर पसारते डेंगू के बीच जब डॉ. रत्नेश से हमारे संवाददाता द्वारा स पर्क कर मौसमी बीमारी व इनसे बचाव के स बन्ध में जानना चाहा तो मरीज को देखने में व्यस्त इस डॉक्टर से दूसरे दिन चिकित्सालय जाते समय बात हो सकी। 
डॉ. रत्नेश जैन का कहना था कि यूं तो इस मौसम में जुकाम सर्दी, बुखार, गैस, टाइटिस, दस्त, पेट दर्द, उल्टी, मलेरिया, डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा बना रहता है। मगर इनसे बचाव का सबसे अच्छा उपाय नियमित दिनचर्या सन्तुलित जैसे ताजा भोजन, फुल साइज कपड़े जिससे शरीर का अधिकांश भाग डका रहे। इसके अलावा खुला रखा हुआ या बासा रखा हुआ खाना नहीं खाना चाहिए शुद्ध पेयजल पीना चाहिए तथा इसके अलावा घर के आसपास या घर में गन्दगी न होने दे पानी को ढक कर रखे अधिक मात्रा में पानी अधिक दिनों तक संग्रहित न करें। 
किसी भी प्रकार की बीमारी होने पर नजदीकी स्वास्थ्य केन्द्र या डॉक्टर को बताये उसके परामर्श अनुसार ही दवा ले। 
शहर में चलते वक्त मुंह पर कपड़े का इस्तेमाल करे जिससे एलर्जी से बचा जा सके । 
अन्त में डॉ. रत्नेश का कहना था कि नियमित दिनचर्या, व्यापाम सन्तुलित भोजन और फुल साइज के कपड़े साफ सफाई के साथ रहना ही स्वस्थ रहने का एक मात्र इलाज है। क्योंकि दवा तो तत्कालिक बीमारियों से निजात दिलाती है मगर दिनचर्या हमेशा दिलाती है मगर दिनचर्या हमेशा स्वच्छ रखती है। 

    बिलोनी में सुविधा तो है,रोजगार नहीं 
विजेज टाई स, 23 सित बर 2015- म.प्र. ग्वालियर जिला शिवपुरी की तेहसील के ग्राम बिलोनी में शिक्षा, पेजयल सड़क बिजली तो है मगर रेाजगार नहीं बन भूमि पर बसे इस गांव में यूं तो 30 आदिवासी परिवार रहते है जिनकी भूमि भी है। मन आदिवासियों के बजाये अन्य जातियां ज्यादातर भूमि पर काबिज है जिसके चलते इन मजदूरों को अन्यत्र मजदूरी के लिये जाना पड़ता है। जिसके चलते इनकी हालत किसी खाना बदोत परिवारों से कम नहीं। 
ऐसी ही हालत नरवर के ही ग्राम तालपुरा के मजरे की है जहां लगभग 12 आदिवासी परिवार निवास करते है जहां न तो आज तक वन भूमि के न हीं आवासों के पट्टों वितरित हो सके है। खेती किसानी होने के बावजूद भी इन्हें मजदूरी के लिये अन्यत्र भटकना पड़ता है।

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