तुम पुजारी, हम भिखारी, कोई शक...?

व्ही.एस.भुल्ले @तीरंदाज। 
भैया- अब भी कोई विवाद हो तो बता, हारे महान लेाकतंत्र के मन्दिर में क्या चल रहा है। हाथो हाथ बता, कम से कम अब तो हारे भविष्य पर बात हो रही होगी, माननीयों के प्रयासों से कोई तो ऐसी नीति बन रही होगी जिससे हारे महान श्रीमान कम से कम हारी समस्या सुन, हाथो हाथ तो निवटा पायेगें और देश में डकराते लेाग स्वत: ही समस्या विहीन हो, चुप हो जायेगें।

भैये- तने तो बावला शै कै थारे को मालूम कोणी, कै हारे माननीयों के हाथ कोई जादू की छड़ी थोड़े न, जो एक झटके में ही सब कुछ ठीक हो जायेगा और थारे जैसा न समझ नंगा, भूखा इस हाइटेक जमाने में खुशहाल जीवन बितायेगा। कै थारे को मालूम कोणी हारे देश के पूर्व प्रमुख डागधर मनमोहन सिंह भी यहीं बात कह चुके और मैं भी दोहराता हूं कि माननीयों पर कोई जादू की छड़ी नहीं जो हारे श्रीमान एक छटके में सुधर जाये। एक मौके पर थारी स्थति देख मने तो काका हाथ रसी की कविता की दो पंक्तियों याद आवे।
अहो साढ़ बल बान, अहो देेवन के देवा।
मार छपट्टा मुंह भरके, करो कलैबा।।
सो भाया यह व्यवस्था न तब थी, न अब है अन्तर सिर्फ इतना मात्र है कि तब हम गुलाम थे। मगर आज आजाद है, सो भैये जो भी बोले कुछ स हल कर बोलना। कै थारे को मालूम कोणी हारे लेाकतंत्र में सच बोलने वालो की हालत पतली हुई पढ़ी है।
और झूठो की जमात अब मजबूत हो चली है।
भैया- तो क्या मने हारे महान लेाकतंत्र और हारे महान माननीयों के रहते ऐसे ही बैवस बिलखता मर जाऊं, मिलने वाली शासकीय सुविधा भले ही न मिले, क्या मने नैसर्गिक , प्रकृति प्रदत्त सुविधाओं के लिये भी न डकराऊ, जिसमें किसी का कोई सहयोग न हो, अर्थात शुद्ध पेयजल, सर पर छत और सड़क पर भी हक न जताऊं। क्योंकि लेाकतंत्र के नाम लामबन्द माननीयों को तो सत्ता झपट से फुरसत नहीं और श्रीमान हारी सुनते नहीं। ऐसे में मने कै करुं तू ही कुछ बता। प्रभु नारद ने तो सतयुग में हम दीन हीनो की अपने हुनर से मदद की, इस कलयुग में तू ही कुछ कर दिखा। कम से कम नारंद वंशज कहलाने का तो धर्म निभा।
भैये- हारे को तू ज्ञान, विज्ञान मत बता सो थारे को मालूम कोणी सतयुग में लेाग सत्य बोल सदाचार के साथ जीवन जीते थे और समय से ईश्चर की आराधना भी करते थेे, क्या आज ऐसा कुछ हो रहा है ? हर एक नंगा, भूखा जिन्दा रहने के लिये बस खाने, पीने के सिवाये और कुछ कर रहा है। तो थारे को हारे जैसे चिन्दी पन्ने वालो की जरुरत आन पढ़ी है। वहीं बुद्धिजीवी और घर बैठकर देश सेवा करने वालो की पूरी की पूरी फौज तो खड़ी है। जिन्हें स्वयं के स्वार्थ और जबानी जमा खर्च से फुरसत नहीं, न उन्हें नैतिक, अनैतिक और न ही उन्हें कोई संस्कार दिख रहा है बस स्वयं का स्वार्थ और खुद का भला कैसे हो, इसी रास्ते पर सत्ता से इतर हर बुद्धिजीवीक कहे जाने वाला प्राणी चल पड़ा है। मैं तो बौल्यू भाया गर कुछ दिन और ऐसे ही चलता रहा तो बिलखना, बैवस, डकराना तो दूर, देश व प्रदेशों में बढ़ रही अराजकता की आंधी तू क्या, थारे जैसे लेागों के झुन्ड तक को उड़ा ले जायेगी। और इन्सानियत किसी कोने में खड़ी दम तोड़ती नजर आयेगी।
भैया- मगर हारे जैसे दीन-हीन अभावग्रस्त लेागों का कोई अपराध तो बता, हमने ऐसा क्या कुछ किया है ? जो हारे ही देश में हारे लेाकतंत्र के बीच माननीयों के रहते हम पराये हो लिये।
भैये- बात अपने पराये की नहीं, यहां बात नसमझ और समझदारों की है जो हर 5 वर्ष में अपना उल्लू सीधा कर संगठित सत्ता का लुप्त उठाते है। अब तो जमाना सेवा भाव से इतर सतत सत्ता में बने रहने का है। सो जो भी थारे माननीयों से बन पढ़ रहा है। सतत सत्ता में बने रहने थारे जैसे लेागों को अभियान चला कर रहे है और थारे जैसा व्यक्ति कभी परिचित, तो कभी नाते रिस्ते, धर्म, जाति, क्षेत्र, पऊआ पैसा लेकर ऐसे माननीयों को चुन सत्ता भोगने सदनो तक भेज रहे है। जिन्हें तबज्जो देना आज हारे महान श्रीमान अपनी तौहीन समझते है, शायद इसीलिये श्रीमान और उनके मातहत थारे जैसो को दुदकारते है।
भैया- मने समझ लिया अब आने वाले समय में शायद ही हम गरीबों की सुनवाई हो पायेगी गर ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में भी ऐसे से ही माननीयों की जमात चुन ली जायेगी। जिनका हारे श्रीमानों पर कोई असर न होगा। मगर तने भी भाया कान खोलकर सुन ले, जिसने चुन दिया है, वह चुना भी देगा। जरुरत पढ़ी तो इस देश-प्रदेशों का गरीब कोई न कोई नये माननीय की जमात चुन लेगा, फिर सतत सत्ता सुख के भी परखच्चे उड़ जायेगें। आज नहीं तो कल हम गरीबों के बच्चे इस देश प्रदेशों की सरकारों को चलायेगें। तब तो हारी सुनवाई होगी और श्रीमानों की भी जमात किसी नेता, नेती नहीं हम गरीबों के प्रति उत्तरदायी होगी।
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