बटते बटोने से, कुछ माला माल, तो कुछ बेहाल

व्ही.एस.भुल्ले। सुना था कि चुनाव मुद्दों पर जीते और हारे जाते है, मगर कुछ वर्षो में मुद्दें गौड़ और जनभावनायें दम तोड़ती नजर आ रही है क्योंकि अब सत्ता में आने और सतत सत्ता में बने रहने के लिये प्रबन्धन ने स्थान ले रखा है। सो जिसका जैसा प्रबन्ध उतने दिन, वर्षो की उसकी सरकार, शायद किसी नेता ने कभी सच ही कहा था कि चुनाव मुद्देां पर नहीं प्रबन्धन से जीते जाते है।

सो उनका 10 साला निजाम उनके बेहतर प्रबन्धन के चलते जाता रहा, मगर नया निजाम तीसरी पारी खेल चौथी पारी की तैयारी में है और हो भी क्यों न जब विपक्ष रैंगने ही नहीं घसिटने पर मजबूर हो और चुनावी तैयारी जनता के धन पर पूरे 5 वर्ष तक हो, साथ ही चुनावी प्रबन्ध की व्यवस्था निरन्तर हो, तो कौन माई का लाल है जो सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सके।

क्योंकि बेहतर भविष्य की तलाश में गरीब, तो कुछ रोजगार के आभाव में भूखो मरने के कागार पर हो और महत्वपूर्ण कार्यो के केन्द्रीयकरण हो जाने से कामगार बेरोजगार हो। ऐसे में सत्ता द्वारा स्वयं को राजा समझ बटोना बांटने वालो के मोहताज हो, उनके मुरीद हो जिन्दा रहने जरुरी है कि वह उनकी जय-जय कार करें। जिस राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर और सुनने वाला कोई न हों, ऐसे में उस राजा की याद आना लाजमी है कि जब वह अपनी प्रजा को मौके, झौके पर महल से बाहर निकल ब सीस बांट महल लौट जाता था। बैचारे लोग दुख, दर्द, अत्याचार, अन्याय शिकायत बिना कहे ही मायूस रह जाते थे।

मगर इन प्रबन्धकों के  बीच गनीमत है कि राजा स्वयं को सेवक, मगर उसकी सल्तनत में इन्सानियत बूटो तले रौंधी जाती हो, और सच बोलने वालो की व्यवस्था के नाम बोलती बन्द कर दी जाती हो। जिसकी सल्तनत में युवा बेरोजगार इन्जीनियर, स्नातक हजारों की तादाद में चपरासी बनने तैयार है। एक कुशल श्रमिक से कम से वेतन पर आशा, आंगनबाड़ी, सहायिका के रुप हजारों महिलायें कार्य करने मजबूर हो, ऐसे में प्रदेश की समृद्धि का अन्दाजा लगाया जा सकता है।

हर वर्ष करोड़ों, अरबों फूक होने वाली ग्लोबल मीट का परिणाम ये है कि प्रबन्धन के चलते उघोग मंत्री के ही क्षेत्र में बड़ा तो बड़ा, कोई छोटा उघोग तक खड़ा नहीं हो सका। फिलहाल कोई उघोग लगा हो या न लगा हो, मगर म.प्र. में शराब उघोग अवश्य चमक गया। जिसका आंकड़ा सैकड़ों करोड़ पार हो, हजारों करोड़ तक जा पहुंचा। अगर यो कहे कि म.प्र. में कोई औद्योगिक हब न बना हो, मगर व्यापारिक रुप से शराब हब के रुप में जरुर बन गया। जहां छोटे से छोटे जिले में लगभग ढाई सौ करोड़ से लेकर पाँच सौ करोड़ तक का शराब व्यापार सरकार के संरक्षण में चल रहा है। अगर जनभावनाओं की यहीं पुकार है तो निश्चित ही प्रबन्धकों  की चौथी बार भी, नैया पार है।
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