रोते, बिलखते बैबस लेाग और माननीय आप, कहां जाये हम

व्ही.एस.भुल्ले। हमें नहीं पता कि सदन और सरकार कैसे चल रही है क्यों पक्ष-विपक्ष के बीच किन मुद्दों को लेकर रस्साकसी मची है।  हम रोते, बि...

व्ही.एस.भुल्ले। हमें नहीं पता कि सदन और सरकार कैसे चल रही है क्यों पक्ष-विपक्ष के बीच किन मुद्दों को लेकर रस्साकसी मची है।  हम रोते, बिलखते, बैवस लेाग यह जानना भी नहीं चाहते, मगर माननीयों हमें तो आप इतना ही बता दीजिये, किसी टी.व्ही. चैनल, अखबार या फिर मन की बात कहने वाले रेडियो पर ही सुना दीजिये, कि हम आये दिन दैत्य की तरह मुंह फैलाये खड़ी समस्याओं को लेकर कहा जाये।
आखिर किस दरबाजे को खट खटाये, जिनके समाधान के लिये, हमने आपको चुन संसद, विधानसभाओं में भेजा था, आपकी दी जाने वाली सेवा, सुविधाये, पूरे दाम चुकाने और आपके अधीन संचालित संस्थानो द्वारा पूरे दाम, राजी गैर राजी बसूलने के बाद भी सेवा, सुविधायें नसीब नहीं।
माननीयों हमें इस बात का भी खेद नही कि हमें हमारे देश, प्रदेशों में हमारे द्वारा चुनी हुई सरकारों के  रहने के बावजूद भी ठीक से, प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक सुविधाये भी नसीब नहीं।
हमें तो अफसोस इस बात का है कि हमारे द्वारा हमारे चुने हुये जनप्रतिनिधियों की भी, माननीय आपके नौकरशाह अर्थात श्रीमान सुनने तैयार नहीं।
कुछ करे या न करे श्रीमान, हालात ये है कि वह अब तो झूठी संतावना भी, हमारे पैसे से मिली संचार सुविधा का भी रिसीवर उठाने तैयार नहीं।
माननीयों न जाने क्यों हमारे श्रीमान अपने मातहतो की मक्कारी, चोरी पकड़े जाने के बावजूद भी चुप रहते है। वहीं माननीयों आप भी तो भाषण, उदघाटनों और मीटिंगों में व्यस्त रहते है।
अब देखो न समुची सरकारों के रहते जनता डकरा रही है। व्यवस्था के नाम जनता के गाढ़े पसीने की दौलत किस तरह जनकल्याण, सेवा, विकास के नाम उलीची जा रही है।
 जिस देश में लेागों को चलने यात्रा करने ठीक से सुरक्षित वाहन नहीं उस देश में माननीय आपके मंत्री, प्रधान, मु य, हवाई जहाज, हैलीकॉप्टरों से दिन रात उड़ रहे है जिस देश में लेागों को भारत सरकार द्वारा स्थापित मापदण्डो के विरुद्ध भी पेयजल सुगमता से नसीब न हो, उस देश में माननीयों आपके श्रीमान विस्लरी, एकोरा और न जाने किन-किन क पनियों का पेयजल पी रहे है। भले ही गांव-गांव शुद्ध पेयजल नसीब न हो, मगर खुलेयाम पऊयें अवश्य बिच रहे है माननीयों बाते तो बहुत है मगर हम नसमझ यह समझने पर अवश्य मजबूर हो रहे है कि आखिर आप लेागों की सरकार के रहते श्रीमान हमारी क्यों नहीं सुनते। क्यों हमारे धन से पगार लेने वाले हमें सेवा, सुविधा न दे हम पर ही आंखे तरेरे रहे है।
क्यों हम नसमझों को पूरे दाम चुकाने के बाद भी गुणवत्ता पूर्ण खाद्य पदार्थ या अन्य सामग्री शुद्ध नहीं मिल रहे है। जिन जहरीली दवाओं को सरकारों द्वारा बन्द किये वर्षो वर्ष बीत गये, मगर धन लालची आज भी खुलेयाम बाजारों में बैच हमारी आने वाली नस्लो तक को नष्ट कर रहे है।
माननीयों आप तो समझदार है इसीलिये तो हम नसमझ लेागों ने आपको चुना है। हो सकता है चुनाव के दौरान हमारे ही बीच के कुछ लेाग मजबूरी बस, किसी नसमझ की पऊंआ, पैसे की भूल रही होगी। मगर हमें विश्वास है कि कुछ समझदार, भले लेागों के वोटो से भी आपकी जीत हुई होगी। आपको उनका ही नहीं इस देश का वास्ता, आपको आपके सुनहरे भविष्य का वास्ता आप कुछ करो। हमें बड़ी उ मीदे है आपसे। बैसे आपके श्रीमान, बैठको और उनके मातहत हमारी कहा सुनते थे, अब तो आपने सप्ताह में 5 दिवस ही काम के छोड़े है। और दो दिवस का अवकाश खुलेयाम दे डाला। मगर लगता नहीं, कि हमारे श्रीमान या मातहत अब भी हम गरीबों की सुन लेेगें, क्योकि श्रीमान व उनके मातहतो के बड़े अनाप सनाप वेतनो के बढऩे का इतिहास गबाह है, मगर देश या प्रदेशों में वेतन बढऩे के बावजूद भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ। बैसे भी हमारे श्रीमान स्वीच्ड ऑफ कबरेज ऐरिया रहते थे। अब तो दो दिन बाद ही स पर्क हो सकेगा।
बेहतर हो माननीय की आप ही कुछ करे, बरना हमारी शेष जीवन गाथा आपका हुड़दंग और श्रीमानों की दुदकार और मातहतों के धक्के  खाते बैवसी के बीच डकराते निकल जायेगी। फिर माननीयों आपको हमारी बहुत याद  आयेगी। 

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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रोते, बिलखते बैबस लेाग और माननीय आप, कहां जाये हम
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