बड़ी विचित्र स्थति है, सिंधियाओं के प्रिय शहर की

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स, म.प्र. शिवपुरी। यूं तो सत्ता सियासत और सिंधिया घराने के बीच छत्तीस का आंकड़ा आजादी के बाद ही नहीं सिंधिया स्टेट के म.प्र. में मर्ज होने से लेकर आज तक रहा है और आज भी वह अनबरत जारी है मगर सियासत के इस खेल में शिवपुरी को क्या मिला इसकी दुर्दशा बताती है कि बरबादी के सिवा कुछ नहीं मिला और एक खुशहाल  साफ सुन्दर स पन्न शहर बरबाद हो, दल-दल में तबदील हो गया।

सियासत की आड़ में संगठित सियासतदारों की शह पर जिस प्रकार की महा लूट शिवपुरी मेें विगत वर्षो में हुई या चल रही है जैसा कि अपुष्ट, पुष्ट सूत्र बताते है, कि शिवपुरी में मची इस महा लूट में न तो  जनभावनाऐं शेष रही, न ही महापुरुषों मेहनतकश ईमानदार लेागों का मान-स मान, स्वभिमान बचा, अब्बल सुगम, सुन्दर सड़क, भवन, भूमि, ताल तलैया, बाग बगीचों का नामो निशान तक मिट गया। रहा सवाल सेवाओ का तो शुद्ध पेयजल के नाम मलमूत्र युक्त, बरसात का इकट्टा पानी या बोर बैल बचे है जिसमें आती जाती बिजली बन्द चालू होता ब्रॉडबेन्ड सड़कों पर पसरा अतिक्रमण का सन्नाटा व्यवस्था को मुंह चिड़ाता नहीं थकता।
शासकीय धन की महालूट भी ऐसी कि अरबों रुपया नगर, तो प्राकृतिक स पदाओं की लूट का ल बा चौड़ा खेल इस जिलें में खुलेयाम चला है। नव धनाडयों की बेईमान फौज का इन सियासत दारो के संरक्षण में खूब कांरवा फला फूला है क्या वाक्य में ही यहीं हमारे आजाद भारत के महान लेाकतंत्र और सियासतदारों का सच बचा है, मगर शिवपुरी को लेकर उठे इस सवाल का जबाव आज भी आखिर शिवपुरी को क्यों नहीं मिल रहा है ?
इतिहास में जाये तो सत्ता और सिंधिया स्टेट से राजी नहीं तो, गैर राजी टकराब आजाद भारत की नई सरकार के समय से रहा है।  म.प्र. के मुखिया स्व. डी.पी. मिश्रा सरकार के दौरान ग्वालियर के दो छात्रों की पुलिस की गोली से मौत से शुरु हुआ सीधा टकराब,  इमरजेन्सी के समय भारत सरकार के सियासतदार, उसके बाद म.प्र. में फिर एक नई सरकार जो स्व. अर्जुन सिंह के नेतृत्व में रही, उसके सियासतदार एवं जो लोग आजादी के नाम स्वयं का तीव्र और स्वच्छन्द विकास चाहते थे उनसे निरन्तर बना रहा।
स्वर्गीय अर्जुन सिंह की सरकार से लेकर दिग्विजय सरकार तक लूटपाट, मान-स मान की राजनीति सियासत शिवपुरी में दबे पैर शिवपुरी के साथ लुकाछिपी का खेल-खेल अपनी जकड़ में लेती रही। मगर शिवपुरी तब भी सुरक्षित रहा, मगर शिवपुरी की किस्मत का बेड़ागरग तब हुआ, जब म.प्र. में भाजपा नेतृत्व वाली सरकारे आई। और सियासत का खेल सत्ता के इसारे पर एक बार फिर से आक्रमक ढंग से शुरु हुआ, मगर कुछ समय तक तो सब कुछ बड़ी ही सावधानी पूर्वक नजरो के लिहाज में रहा,  मगर इस बीच नव सियासतदारों ने, सत्ता की हनक के चलते ऐसा षडय़ंत्र रचा कि  शिवपुरी को बैवजह ही उप चुनाव की आग में झोंक दिया गया, फिर क्या था सियासत रचने वालों ने एक ऐसा षडय़ंत्र रचा जिसमें समुचा उप चुनाव म.प्र. की शिव सरकार बर्सेज सिंधिया घराना हो गया। जिसमें खुलेयाम निष्ठाये, खुद्दारी, सत्ता, सियासत की खातिर सब स्वाहा हो गया और चुनाव के इतिहास में लेागों ने पहली मर्तवा महसूस किया कि किस तरह शराब, पैसा चुनावों मेें चलता ही नहीं लुटता भी है। हालात ये कि म.प्र. सरकार के समुचे मंत्री, नेता स्वयं मु यमंत्री ने दिन रात एक कर चुनाव जीतने का प्रयास किया, मगर शिवपुरी की जनता ने सिंधिया नाम का साथ नहीं छोड़ा। शायद ऐसी करारी हार किसी और सरकार को कभी मिली हो, उसके बाद तो मानो इस शहर पर आफत का पहाड़ टूट पड़ा। फिर क्या था सत्ता सियासत का फिर ऐसा खेल चला कि सिपहसालार लूटपाट के माल से मालामाल होते रहे, तो कुछ सिंधिया कै प में जगह बना माल झपकते रहे और उसी माल से और माल बनाने सच को झूठ और झूठ को सच बता अपनी सियासत चमकते रहे।
बैचारी बैबस जनता की जनभावनायें न तो वह सिंधिया घराना ही समझ पाया, जो दिन रात तक कर करोड़ों, अरबों की योजना व बजट से अलग से शिवपुरी को दिला, अपना कत्र्तव्य पूरा समझते रहे और न ही वह सरकार यह समझ पायी, जिसे भी शहर की जनता ने वोट दिये। परिणाम कि सर से पानी गुजरने के बाद जनता स्वयं अब संगठित हो, जल आन्दोलन के रुप में सड़क पर है।
शहर की हालत आज इतनी बद से बत्तर बन चुकी, कि अब इसे शहर कहना भी सफेद झूठ और इसे जनसेवा कहे तो  महा झूठ है अब अगर शेष बचे शहर में मान-स मान, स्वाभिमान और स्वच्छ सेवा भावी सियासत की बात करे तो, वह भी  फरैब होगा, ऐसी सियासत को शिवपुरी के इतिहास में न तो कभी वो राजनैतिक दर्जा प्राप्त होगा और न ही वो मान-स मान जिसकी कल्पना आम नागरिक अपने सियासतदार सत्ताधारी दल, विपक्ष से करता है।  और न ही इस तरह की राजनीति को स्वच्छ और सेवा ाावी कहा जा सकता।
देखना होगा आ िार कब शहर की जनता अपने अधिकार कत्र्तव्य समझ झूठी रुमर फैला स्वयं की सियासत चमकाने वाले लेागों को अच्छा शबक सिखाती है।
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