शिवपुरी का सच: लोग खुश, मगर मैं दु:खी हूं

जिस पेयजल को पीने से मानव जाति कतिगति हो, उसे हम पी रहे है जहां सेवा, सुविधा के नाम लूट मची हो, उस शहर में न तो हमारे सर्वसुविधा युक्त शहर में घोषित रुप से बिजली है, न ही शुद्ध पानी सेवा, सुविधाओं के नाम ऐसी बसूली कि इस देश को गुलाम बनाने वाले भी इस शहर की हकीकत देख थर्रा जा जाये। जिस प्रदेश का मु यमंत्री 3 तीन झूठ बोलने के बाबजूद चौथा झूठ बोलने के कगार पर हो, उससे बहुत अधिक उ मीद भी बैमानी है।

मगर इस शहर का सच यहीं है जहां सियासत चर्मोकर्ष पर है। न तो इसे देखने, मानने इस शहर का नेतृत्व और न ही शुभिचिन्तक तैयार है। क्योंकि इस शहर में सियासत बड़ी गहरी है। और अज्ञान जनता इस दुराग्रह से अज्ञान सो मुसीबते झेलना और नरकीय जीवन जीना अब इस शहर की नियति बन गई है। सो कोई मुंह खोलने तैयार नहीं।

मगर मुझे असहनीय पीढ़ा है और अफसोस भी कि कोई भी सत्ता या सरकार इस तरह से 2 लाख से अधिक लोगों के साथ कैसे अन्याय कर सकती है। मगर म.प्र. का एक शहर शिवपुरी है उसके साथ ही हो रहा है, लेाग विलख ही नहीं कलफ रहे है। अपनी बैवसी पर मगर मजबूरी बस सवाल नहीं कर रहे है। मगर यह कब तक चलेगा कभी होगा उन सरकारों से जो दल बल, धन,बल या फिर जनाकांक्षाओं की दुहाई दे सत्ता में है उस दल और उस दल की सरकारों से सवाल साफ है कि इस शहर की जनता ने हराया या जिताया, मगर आपका राजधर्म क्या कहता है।
राजधर्म कहत है राज्य के हर निवासी का जीवन सुरक्षित, खुशहाल बनाना उसका कत्र्तव्य है जो सत्ता में है।
मगर अफसोस कि राजधर्म का पालन नहीं हो रहा है।
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