लूट तंत्र में तब्दील होता लेाकतंत्र

वीरेन्द्र शर्मा. वोटो की बैवसी, लाचार संस्थाऐं , बेकार हुआ तंत्र, संगठित लूट में पिसती मजबूरी भावनायें और जनाकांक्षायें आजादी की 68वीं वर्ष गांठ पर भी में बैवस, मायूस और घुटन महसूस करता हूं जिधर भी देखो उधर लेाकतंत्र के नाम अघोषित लूट मची है कहीं जनाकांक्षायें लुट तो कहीं सरेयाम मजबूरी नीलाम हो, बूटो तले रौंधी जा रही है। तो कहीं भावनाओं की लूट मची है वहीं मजबूरी का आलम यह है कि इस मची लूट में वह कभी बैवस, लाचार और घुटन भरे माहौल में रुधन करने पर मजबूर है।

अब दोष जिसका भी हो, मगर फिलहॉल हकीकत यहीं आज हम कितनी ही डीके क्यों न हांके गांहे बगाहे हमने लेाकतंत्र के नाम अघोषित रुप से एक ऐसी व्यवस्था और समाज का निर्माण कर डाला, जहां मौका पढ़ते ही लेाग नैतिक मूल्य, संस्कारों को भूल धनार्जन करने अघोषित लूट में लग जाते है। जिसके दुष्परिणाम आज सर चढ़कर बोल रहे है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे राष्ट्रपति महोदय ने आजादी की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को स बोधित करते हुये कहा कि लेाकतंत्र की हमारी संस्थाऐं दबाव में है। संसद परिचर्चा के बजाय टकराब के अखाड़े में बदल चुकी है। उन्होंने कहा कि इस समय संविधान की प्रारुप समिति के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अ बेडकर के उस व्यक्तव्य का उल्लेख करना उपयुक्त होगा जो उन्होंने नब बर 1949 में संविधान सभा में अपने समापन व्या यान में दिया था। किसी संविधान का संचालन पूरी तरह संविधान की प्रकृति पर निर्भर नहीं होता। संविधान केवल राज्य के विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका जैसे अंगो को ही प्रदान कर सकता है। इन अंगो का संचालन जिन कारको पर निर्भर करता है वह है जनता तथा उसकी इच्छाओं और उसकी राजनीति को साकार रुप देने के लिये उसके द्वारा गठित किये जाने वाले राजनीतिक दल, यह कौन बता सकता है कि भारत की जनता तथा उनके दल किस तरह का आचरण करेगें, यदि लेाकतंत्र की संस्थायें दबाव में है तो समय आ गया है कि जनता और उसके दल ग भीर चिन्तन करे, सुधारात्यक उपाय अन्दर से आना चाहिए।
वहीं देश के प्रधानमंत्री ने भी लाल किले की प्राचीर से देश को स बोधित करते हुये उनकी सरकार के द्वारा विगत वर्ष मेंर किये गये कार्यो का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किया  उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार के दौरान 1 पैसे का भी भ्रष्टाचार का कोई प्रकरण सामने नहीं आया। उनकी सरकार किस तरीके से भ्रष्टाचार रोक रही है। वह भी देश वासियों को बताया। उन्होंने गुडगर्वनेन्स की खामी का जिक्र भी किया साथ ही उनकी सरकार द्वारा देश के आम गरीब, बेरोजगार,आदिवासी, अनुसूचित जाति, किसान, मजदूर, सैनिक, छोटे उघामियो के लिये क्या-क्या कार्य कर रही है और करना चाहती है। वि िान्न आपत्ति, विपत्तियों का जिक्र करते हुये उन्होंने अपनी सकारात्मक, विकास उन्मुख सोच और आशावादी  द्रष्टिकोण के सहारे देश के सपने को सच करने निरन्तर कार्य करने का संकल्प देाहराया।
निश्चित ही राष्ट्रपति पद की गरिमा अनुसार देश के हालातों पर राष्ट्रपति महोदय ने अपनी बात रखी, वहीं प्रधानमंत्री महोदय ने भी अपने राजनैतिक दल और सरकार की प्रतिष्ठा अनुरुप उस दायरे में बात कही, जो किसी भी प्रधानमंत्री का कहना लाजमी हो सकता है।
मगर इन सब के बीच यक्ष सवाल वहीं है कि जिन दुष्वारियों, पीढ़ा, बैवसी, शोषण से बचाने देश वासियों ने अंग्रेजो से लोहा लिया, लेाकतंत्र को अंगीकार किया। क्या आज उन जनाकांक्षाओं की पूर्ति हो पा रही है।
बड़े-बड़े विकास, सुविधायें तो अंग्रेजो ने भी हमारे देश में खड़ी की भले ही उन्होंने अपना साम्राज्य बनाये रखने के लिये की हो। मगर उनके समय की निर्मित सरंचनाये आज भी कार्य कर रही है। उनके समय की सिद्धान्त: सुरक्षा, शिक्षा, सेवा, भले ही उन्हें परिणाम उनके मनमाफिक देती रही हो, मगर क्या अब हमारे मनमाफिक इन क्षेत्रो में काम चल रहा है, तो जबाव होगा नहीं।
अगर यो कहे कि अंग्रेजो के समय मूल्य चुकाने के बाद नकली खादय साम्रगी, नकली, डिग्री, घटिया संरचना और सेवा, सुरक्षा के नाम कम से कम लूट नहीं थी। वे ताकत या फरेब, अत्याचार कर अपना साम्राज्य कायम रख, देश को लूटते थे कम से कम भावनाओं की लूट तो नहीं थी।
मगर दुर्भाग्य कि आजादी के 67 वर्ष यह सब चरम पर है, लेाग बैवस, लाचार है मायूस है, मजबूर लेागों की आत्मा आज कलफती, रोती है। मगर संवेदना के दो शब्द भी आज फोकट में नसीब नहीं, लेाग आज भी कलफ रहे है।
ऐसा नहीं कि सिर्फ गरीब, मध्यम या उच्च आर्य वर्ग के ही लेाग शिकार हो इस लेाकतंत्र में दुरव्यवस्था को देख हर एक भला इन्सान कलफ रहा है। इसके चलते आज हमारा और व्यवस्था अघोषित रुप से दो भागों में विभक्त होता जा रहा है। एक वो जो प्रकृति के विरुद्ध जंगली जीवन जीने किसी प्रकार की नैतिकता, मूल्यों में विश्वास नहीं करते। वह यह भी मानने तैयार नहीं कि उनके जिस आचरण से अन्य कोई प्रताडि़त होगा। कल किसी और के आचरण से उसे भी पीढ़ा उठाना पढ़ सकती है। अधिकार के नाम व्यक्ति जिन कत्र्तव्यों की होली चिता, कुर्सी या जहां भी बैठ जला रहा है। स्वयं स्वार्थ और धन की खातिर कल उसे भी उसमें भस्म होना है। मगर व्यवस्था, समाज में जाने, अनजाने में बड़े पैमाने पर चल रहा है।
दूसरा वर्ग वह है जो नैतिक मूल्यो के साथ प्रकृति केअनुरुप खुशहाल जीवन जीना चाहता है मगर सं या कम होने के कारण वह बैवस लाचार और मायूस है। क्योकि हमारे लेाकतंत्र की सर्वोच्च संस्था का संचालन बहुमत के आधार पर होता है। जिसकी सं या ज्यादा वही लेाकतंत्र का बड़ा पैरोकार बन जाता है।
  जिस लेाकतंत्र में प्रति व्यक्ति प्रति दिन आय के आंकड़े दो अंकों में हो, शिक्षा, सेवा, सुविधा, सुरक्षा के खर्चे  3-4 अंक में हो और वह भी ठीक से नसीब न हो तो कल्पना की जा सकता है।
क्योंकि माननीयों को सत्ता सुख और नौकरशाहों को सुनने की फुरसत नही। और सरकार, शासन के बाहर सेवा, सुविधा देने वाले ल बी संगठित लूटपाट पर उतारु है। ऐसे में एक पीढ़ा दायी, बैवस जीवन के अलावा लेागों के पास शेष क्या रह जाता है।
ऐसे में राजनैतिक दलो, सत्ता सीनो को सतत सत्ता सुख भोगने का आवरण उतार माननीयों को मानवीयता के आधार पर राष्ट्र के लिये कार्य करना चाहिए साथ ही दलो से ऐसे लेागों को दूर र ाना चाहिए जिनका जनसेवा, राष्ट्रसेवा से दूर-दूर तक वास्ता न हो, जनता को भी समझना होगा कि सरकार जिसकी भी बने, मगर उनके द्वारा चुना हुआ जनप्रतिनिधि  पढ़ा लिखा समझदार और जनभावना अनुरुप बेहतर सोच रखने वाला होना चाहिए।
तथा भले और बुद्धिमान लेागों का कत्र्तव्य है कि वह समाज व राजनीति में बढ़ रहे नकली व्यक्ति बाद जनसेवा के नाम लूटपाट करने वालो के विरुद्ध जनमत तैयार करते रहे। साथ ही धन लालसा में अन्धे मिलावट खोर, या मजबूरी का लाभ उठा छोटी-छोटी लूट खसोट, सेवा के नाम करने वालेा को बैनकाब करे। तभी हम हमारा सच्चा और अच्छा लेाकतंत्र बचा स प्र भू स पन्न, सुरक्षित, खुशहाल राष्ट्र, बन पायेगें।

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