सेवा, शिक्षा में बढ़ता पूंजीवादी सम्राज्यवाद देश को घातक

व्ही.एस.भुल्ले। माननीयों आप से हम देश वासियों को बड़ी उ मीद है हम मानते है जब से आपको  हमने  अपना बहुमूल्य मत दे हमारे कल्याण, खुशहाल जीवन, सुरक्षा और भारत मां की रक्षा के लिये चुना है। तभी से दिन रात एक कर आप हमारे देश व देश के करोड़ों लेागों के कल्याण खुशहाली, सुरक्षा हेतु चिन्तित हो, मौजूदा नीतियों के अलावा, नई नीतियाँ बनाने में जुटे होगें। हमें कतई संदेह नहीं कि हमारे देश के  सत्ताधारी दल विपक्ष, हमारे चुने हुये जनप्रतिनिधि अर्थात माननीयों पर। हमें पूर्ण विश्वास है। कि कार्य पालिका में बैठे हमारे विद्ववान श्रीमानों की पूरी फौज आपके  द्वारा बनाई गई या मौजूदा नीतियों का देश व जनकल्याण मेें क्रियान्वयन पूरे देश में बड़ी मुस्तैदी से करने में जुटी होंगी।


मगर माननीय हमें आपके  त्याग, कत्र्तव्य निष्ठा पर जरा भी किन्चित मात्र  शक नहीं, हमारी चिन्ता तो इस बात को लेकर  है कि जिस तरह से शिक्षण संस्थानों की फीस 50 से 60 ला ा तक डोमेट जैसे कॉलेजो में पढऩे सुनने में आ रही है। वहीं एल.के.जी. से लेकर इन्टर तक प्रायवेट स्कूलो की फीस आसमान छूती जा रही है। ऐसे में कैसे सबका साथ, सबका विकास एक साथ हो सकता है ?

क्योंकि किसी भी स पन्न, सुरक्षित, खुशहाल राष्ट्र की पहली सीढ़ी शिक्षा ही होती है जिस पर किसी भी राष्ट्र के भविष्य का निर्माण निर्भर करता है। जब किसी राष्ट्र में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े सेवा भावी सेवा परोसने वाले संस्थान भी अन्धी धन उगाही पर उतर आये तो, उस राष्ट्र के भविष्य का अन्दाजा लगाया जा सकता है जो शिक्षा पैसे के आधार पर देश व देश के लेाग को विभाजित करती हो, जो संस्थान अकूत धन के बल सेवको को तैयार करती हो, आखिर वह शिक्षा कैसे स्वस्थ और सेवक, सेवा भावी हो सकता है। जिसने शिक्षा और काबिलयत हासिल करने लाखों खर्च किये हो, जिस देश की 60 फीसद आबादी, सब्सिटी और सस्ते अनाज की मोहताज हो और स पन्नता का आंकड़ा 30-40 रुपये प्रति रोज की आमदनी पर टिका हो। वह इतनी मंहगी शिक्षा और चिकित्सा जैसी सेवा कैसे कर पायेगें।

बेहतर हो माननीयों आज तक अभी तक जो भी जैसा रहा हो मगर अब तो ऐसी शिक्षा, नीति बना दो जो पूर्णत: राजकीय सरंक्षयण प्राप्त शासन के अधीन हो, स्वास्थ क्षेत्र जैसी शिक्षा इतनी सस्ती और सुगम हो कि 60 फीसद गरीब आबादी से भी देश, व देश वासियों की सेवा करने लेाग निकल पाये।

आखिर परेशानी कहा है ये देश हमारा है, इस देश के भू-भाग पर रहने वाला नागरिक हमारा है, देश् काा सदन और इस देश के सर्वोच्च सदन संसद में बैठने वाले सांसद भी हमारे अपने है। फिर दिक्कत कहा ?
क्यों हम एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति नहीं बना पा रहे। जो सस्ती और उत्तम हो, जिसे हासिल करने देश के किसी भी नागरिक को, कम से कम पैसो के  लिये तो मोहताज न होने पढ़े।

बरना माननीयों शिक्षा के क्षेत्र में पनपता पूंजीवादी साम्राज्यवाद हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। तब न तो आपके पास हमें न ही इस देश को बताने बहुत कुछ होगा। बेहतर हो कि अब अगर कोई बड़ी बहस देश में हो तो वह शिक्षा और सुरक्षा को लेकर हो। तभी हम एक महान देश के नागरिक और आप इस देश के  माननीय कहला पायेगें।

विद्यालयों में शौचालय बनाने में मध्यप्रदेश अन्य राज्यों से बहुत आगे
 भोपाल : शुक्रवार, अगस्त ७, २०१५ विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए शौचालय निर्माण के अभियान को क्रियान्वित करने में मध्यप्रदेश की प्रगति की केंद्र सरकार ने सराहना की। आज केबिनेट सचिव श्री पी. के. सिन्हा ने वीडियो कान्फ्रेंस के माध्यम से राज्यों के मुख्य सचिवों से चर्चा कर शौचालय निर्माण की प्रगति की जानकारी ली। मुख्य सचिव श्री अन्टोनी डिसा ने बताया कि इस वर्ष विद्यालयों में भी प्रवेश ज्यादा होने के फलस्वरुप राज्य ने अतिरिक्त शौचालय बनवाकर विद्यार्थियों को आवश्यकतानुसार सुविधा दी है। देश के बड़े राज्यों में मध्यप्रदेश की प्रगति अपेक्षाकृत बेहतर है। वर्ष २०१३-१४ के साथ मध्यप्रदेश में वर्ष २०१४ -१५ के लिए निर्धारित कार्य सिर्फ तीन माह में पूरा हो गया है। मुख्य सचिव ने वीडियो कान्फ्रेंस में केबिनेट सचिव को बताया कि भारत सरकार द्वारा राज्य को दिए गए ३३ हजार २०२ शौचालय निर्माण के लक्ष्य के मुकाबले अब तक ३२ हजार ६५४ शौचालय बन गये हैं। राज्य के विद्यालयों में अभी लगभग ५०० शौचालय का निर्माण शेष है। इनका निर्माण अगले तीन दिन में हो जाएगा। केबिनेट सचिव ने मध्यप्रदेश में हुए श्रेष्ठ कार्य के लिए बधाई दी। इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव स्कूल शिक्षा श्री एस.आर. मोहंती उपस्थित थे। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि मध्यप्रदेश में बने सभी शौचालय स्थायी शौचालय हैं। राज्य में लगभग २५ हजार अतिरिक्त शौचालय भी बनाए गए हैं। ये अतिरिक्त शौचालय जून माह में ही बनकर तैयार हो गए थे। इस प्रकार अब तक कुल ५८ हजार शौचालय राज्य के विद्यालयों में बन गए हैं।

बच्‍चों के खिलाफ यौन अपराध
नई दिल्ली ०७-अगस्त, २०१५ उपलब्‍ध सूचना के अनुसार, बच्‍चों (१८ वर्ष से कम) के बलात्‍कार के मामलों में वर्ष २०१२, २०१३ और २०१४ में क्रमश बढ़ते हुए क्रम में कुल ८५४१, १२,३६३ और १३७६६ मामलें देश में दर्ज किए गये। राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) ने वर्ष २०१४ से यौन अपराध अधिनियम के अंतर्गत बच्‍चों की सुरक्षा पर आंकड़े जुटाना प्रारंभ किया है। उपलब्‍ध आंकड़ों के आधार पर, वर्ष २०१४ के दौरान यौन अपराध अधिनियम के बच्‍चों की सुरक्षा के अंतर्गत कुल ८,९०४ मामलें दर्ज किए गये। राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के द्वारा पुन: अपराध करने वालों की जानकारी पृथक रूप से नहीं दी गई है। गृह मंत्रालय ने क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रेकिंग नेटवर्क एंड सिस्‍टम्‍स (सीसीटीएनएस) के नागरिक पोर्टल पर महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले दोषी व्‍यक्‍तियों की सूची प्रकाशित करने का प्रस्‍ताव दिया है। यह जानकारी आज लोकसभा में पूछे गये एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में रक्षा मंत्री श्री मनोहर पर्रिकर ने दी।
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment