मातम के बीच, कुदरत का कहर...?

व्ही.एस.भुल्ले @तीरंदाज। 
भैया- हारे महान देश में ये क्या हो रहा है देश के इतने महान सपूत को खोने के बाद हारे मातम में कुदरत का कहर टूट पड़ा है। कै गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश में पानी का सैलाब चल पड़ा है, मगर इस सब के बीच हम गरीबों का क्या दोष जो आफत, आसमान से टूट आदमी बैहाल खड़ा है। मैं तो बोल्यू भाया काठी टूटे उन नाश पीटो की जिनके पापों का दण्ड हारे जैसा गरीब भुगत रहा है।
आखिर क्यों महान कॉग्रेस के कै प से ऐसे सवाल आ रहे है जो किसी भी मानव स यता में स्वीकार न हो, आखि र कौन है कॉग्रेस में वह जयचन्द जो कॉग्रेस को निस्तानाबूत चाहता है यह तो आम अनपढ़ भी समझता है कि सच क्या, गलत क्या जिस देश का प्रधानमंत्री लेाकतंत्र के सर्वोच्च मन्दिर संसद की सीढिय़ों पर माथा टेक स्वयं को गौरान्वित महसूस करता हो, देश की 80 फीसदी आबादी के खुशहाल जीवन का खाका खीचने में सफल होता हो, इतना ही नहीं, टोपी न पहनने वाला इन्सान देश के सच्चे सपूत के भाई के चरण छूता हो, ऐसे में उस इन्सान के नाम पर नारे बाजी उसकी नियत पर शक, आज एक बड़ा सवाल है। बेहतर होता कि शोक के क्षणों में विवाद जो भी हो, कुछ समय के लिये तो यह वाद-विवाद थम जाता। खासकर उस व्यक्ति के शौक के वक्त जिसने स्वयं के शौक के वक्त छुट्टी न रखने की इच्छा जाहिर की हो, मगर थारे जैसे मीडिया वालो का क्या, जो स्वयं की रैकिंग बढ़ाने देश को और उसकी महानता को भूल न जाने क्या क्या दिखा उस मौके सेे देश को अन्जान रखता रहा जिसकी देश को स त जरुरत है। जबकि समुचा देश अटेन्शन में था। सारा सॉशल मीडिया अपने हीरो को अन्तिम बिदाई दे रहा था।
खैर तू छोड़ इन अहम मसलो को तने तो ये बता हारा महान सदन क्यों नहीं चल रहा है ?
भैये- ये तू थारे महान प्रधानमंत्री और महान माननीयो से पूछ, जिन्हें थारे जैसे लेागों ने चुनकर सदन तक भेजा है। या फिर उस महान कॉग्रेस से पूछ जिसे चुन थारे जैसे लेागों ने विपक्ष का ओहदा न देकर सदन में, वे सर पैर की बातों पर हो हल्ला करने भेजा है।
भैया- तो क्या अब हारे महान लेाकतंत्र के मन्दिर, जनता के सर्वोच्च सदन में अब हम दीन हीन गरीबों की बात हो हल्ला सदन स्थगन के बीच कभी नहीं हो पायेगी। और शेष बची जिन्दगी भी लेाकतंत्र में राजा, होने के बावजूद फटे हाल ही कट जायेगी।
भैय- मने तो थारी बात सौ आने सच लागे, क्योंकि धन सत्ता के बढ़ते साम्राज्य में मने तो न लागे थारी बात भी हो पायेगी, क्योंकि सच तो ये है कि हमारे लेाकतंत्र के दलो में मु य स्थान साम्राज्यवादी लेाग ले रहे है। जिनके पीछे हम चल रहे है, सारे स्त भ भी धीरे-धीरे अपनी प्रतिष्ठा खो रहे है और चुने हुये माननीय भी चुनने तक आपके और चुनने के बाद दलो के  इशारो पर सदनो में थारे जैसे लेागों की बात रखने के बजाये हो हल्ला कर रहे है।
भैया- तो क्या हारे माननीय को यह मालूम कोणी कि हारे महान संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण के वक्त स्पष्ट भावना जाहिर की है कि सरकार के केवल सरकार होगी और चुने हुये सदस्य जनप्रतिनिधि जैसा कि सदन में किसी भी मुद्दें पर वोटिंग के वक्त होता है। या तो पक्ष या विपक्ष में वोट डाला जाता है। जिन सबका लक्ष्य राष्ट्र और जनकल्याण से जुड़ा होता है। सत्ता पक्ष का कत्र्तव्य सदन चलाना और विपक्ष का कत्र्तव्य रचनात्मक भूमिका के साथ पक्ष या विपक्ष में चर्चा उपरान्त सदन में वोट के माध्यम से अपना पक्ष दर्ज कराना होता है।
भैये- तने तो बावला शै कै थारे को मालूम कोणी पहले जनसेवा, देश सेवा, अन्तिम लक्ष्य हर दल और चुने हुये जनप्रतिनिधि का होता था।
मगर अब सतत सत्ता में रह साम्राज्य स्थगित कर जनसेवा के नाम स्वयं को महान बनाना है। जिनके लिये अब हर स्त भ अपने-अपने नफा-नुकसान माप देश सेवा, जनसेवा के नाम उन्हीं के अनुसार जुटा है।
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा शायद जन्तर-मन्तर पर केजरी सही बोल्या ये सब मिले हुये है। इसलिये अब हारे जैसे दीन-हीन गरीबों को ही हारे प्रधानमंत्री की तरह लेाकतंत्र के मन्दिरों की ओर कूच करना होगा। और अपने सवालो का जबाव ढूढना होगा, तब तो हारी आने वाली नस्ल बच पायेगी, बरना वह भी ऐसे माननीयों को चुन सरेयाम हारे महान लेाकतंत्र में धक्के खा खा कर दम तोड़़ जायेगी।
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