सेवा की सजा: सल्तनत तो सलामत, प्रतिष्ठा जाती रही

व्ही.एस.भुल्ले @तीरंदाज। 
भैया- कहते है कि शासक सजग न हो, और मार्केटिंग समुची सेवक की, तो सजा मुर्करर होना तो स्वभाविक है। जब सेवक से सवाल होते थे, कि निशंदेह आप एक ईमानदार, नेक दिल इन्सान है तो आपके आजू बाजू भ्रष्ट षंडय़ंत्रकारी क्या कर रहे है ? निश्चित ही उस समय उस शासक या सेवक एक सत्ता के मुखौटे के रुप में नजर आता था। या फिर उसका स्वरुप कुछ सत्ता लोलुप षडय़ंकारियों के  सरदार के रुप में लेागों को समझ में आता था।
जब सवाल सिरे से खड़े होना शुरु हुये और सवालो की सीमाऐं गौड़ होने लगी। अगर यो कहे कि सवालो को लेकर देश भर में कोहराम मचा हो ऐसे में कोई भी शासक या सेवक यह कैसे कह सकता है, कि वह निर्दोष है।  और लोकतांत्रिक ताने बाने को बचाने, आमजन के बीच उठते सवालो के जबाव के लिये वह कोई निर्णय ले रहा है।
भाया कहते है कि सदबुद्धि कभी भी किसी को आ सकती है अगर किसी शासक या सेवक को देर से ही यह सदबुद्धि आ जाये कि जनता क्या चाहती है और समुचे सवालो का सच क्या है ? तो उसका लेाकतंत्र में स्वागत होना चाहिए। क्योंकि सत्ता होती ही ऐसी चीज है।
काश हमारे लेाकतंत्र में चुने जाने वाले शासको ने संविधान निर्माताओं और हमारे महान संविधान की भावना समझ शासन या सेवा की होती तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ते।  चाहे वह पूर्व के केन्द्र शासन के शासक सेवक रहे हो, या फिर म.प्र. के शासक सेवक हो,  संविधान की भावना स्पष्ट है। चुनाव लडऩे और जीतने तक दलो का प्रभाव रह सकता है। जब जनता द्वारा किसी भी प्रतिनिधि को विधानसभा, या लोकसभा सदस्य के रुप में चुन लिया जाता है। तो वह सिर्फ और सिर्फ उस प्रदेश या देश के आम नागरिको के सेवक के रुप में और सरकार में होने पर शासक या सेवक के रुप में माना जाता है। जिसका दायित्व होता है कि वह उस जनता की सेवा बगैर किसी भेदभाव के समुचे प्रदेश या देश में करे।
मगर सत्ता में सतत बने रहने या दलो के आकाओं को खुश करने वह जनभावनाओं और संविधान की भावनाओं को भूल जाते है। और एक न एक दिन दल, दलो के नेता या फिर सतत सत्ता में बने रहने की लालसा बस ली गई। वह उस शपथ को भी भूल, एक ऐसी दुनिया में डूब जाते है जहां से निकल पाना मुश्किल ही नहीं न मुमिकन हो जाता। और जाने अनजाने में हुई गलतियों पर सजा या सवाल का दौर शुरु हो जाता है। जिनका का सटीक जबाव सार्वजनिक जीवन में उतना स भव नहीं होता जैसा जनता या विरोधी दल चाहते है।
फिर भी विपक्ष की मांग और जन दबाव पर सी.बी.आई. के दरबाजे तक पहुंचने वाली जांच से कम से कम विरोधियों के तो मुंह बन्द हो जायेगें, हो सकता है सरकार में शेष रहे भाई के दिन भी आसानी से निकल जायेगें। भाया हारे को तो ये शेर मैमने का खेल पसन्द न आया।
भैये- तने तो बावला शै मने तो पहले ही बोल्या शिकारी बूढ़ा हो, और शेर बब्बर, फिर भी मेमना बंधवा दिया सो भाया एक ही झपट्टे में मैमना हलाल हो लिया।
भैया- मैं न जाड़ू थारी गूड़ बातों को आखिर कै कहना चावे।
भैये- सुनन चावे तो सुन, सत्ता होती ही ऐसी चीज है, बैसे भी राजनीति में साम, नाम, दण्ड, भेद सभी ऑप्सन हमेशा खुले रहते है जब शासन सामूहिक और शासक सरकार का मुखौटा हो, खासकर तब जब किसी पड़ोसी को स्वयं की सल्तनत  को लेकर खतरा हो और जो बेहद सजग और आक्रमक हो, तो ऐसी घटनाये स्वभाविक है जो देश के राजनैतिक पटल पर घट रही है।
भैया- तो अब मने उस हॉरर शॉ का कै करु, जिसे देख सुन, हारी ही नहीं, न जाने कितनो की जाने हलक में अटकी  है। और मुओ ने, घेरा बन्दी कर ऐसी गोटी पटकी है कि, मने तो कुछ समझ न आवे।
मने तो यहीं सोच-सोच कर कलैजा मुंह को आवे कि,  यह दीन-हीन गरीबों और मातृभूमि की सेवा का पुरुस्कार है, या सेवा की सजा। जो भी हो मगर भाया भाई की प्रतिष्ठा तो जाती रही। हे राम।
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