जघन्य अपराध रोकने जरुरी है, बड़ा बदलाव

व्ही.एस.भुल्ले। देश में जब भी जघन्य अपराध सामने आते है तो या तो नया कानून बना दिया जाता है या फिर पुलिस में सुधार की बात कह व्यवस्था द्वारा स्वयं का पिंण्ड छुड़ा लिया जाता है। बजाये अपराध घटने के और भी क्रूर रुप से बढ़, सामने आ रहे है। ऐसे में न तो किसी को उन कानूनों की जरुरत है न ही नये कानून बनाने की, और न ही उस पुलिस सुधार की, जिससे पुलिस का स्वरुप ही बदल, उसे उसके स्वभाव के विरुद्ध बना, उसे बैचेन बना रहा  है, ऐसे में जरुरत है सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की।
जिसमें एफ.आई.आर. लिखने से लेकर, लेागों के बीच पुलिस की पैठ बनाने तक अलग-अलग सैल होना चाहिए। वहीं अपराधों के अन्वेशण हेतु, दूसरी सैल तथा पकड़ा धकड़ और फौर तौर पर अपराध रोकने युवा सैल अलग से होनी चाहिए। वहीं ट्राफिक से लेकर व्यक्ति गत सुरक्षा सार्वजनिक सुरक्षा हेतु अनुभवी फोर्स की अलग से सैल होना चाहिए। तभी समाज में पुलिस की सार्थकता नजर आयेगी।
बरना सुरक्षा  के नाम जिस तरह की होंच पौंच वर्तमान व्यवस्था में बनी है वह कभी कारगार साबित नही हो पायेगी तथा समाज और व्यवस्था के बीच जघन्य अपराधों की सं या इसी तरह बढ़ती जायेगी।
जिसे रोकने की क्षमता शायद ही किसी के पास हो, सच तो यह है कि जिस तरह से जनसुरक्षा के नाम पुलिस के साथ अमानवीय व्यवहार कत्र्तव्य निर्वहन के चलते हो रहा है वह कहीं से भी न्याय संगत नहीं।
ये अलग बात है कि आज भी अनुशासन में बंधी पुलिस सब झेलने पर मजबूर है। और उनका यह कत्र्तव्य भी है, जो समाज में उनका स मान बड़ा उन्हें एक सैनिक का स्थान दिलाता है।
मगर व्यवस्था का कत्र्तव्य है कि वह समय रहते अपने सैनिको के खुशहाल जीवन पर भी ध्यान दे, बरना यूं ही जघन्य अपराध आये दिन सुरक्षा और समाज के सामने आते रहेगें जिन्हें रोकना मुश्किल ही नहीं नमुकिन भी कभी हो सकता है।
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