शहीद सुधाकर के पिता का सच सुन, शर्मसार है हम

सनी कुशवाह। विलेज टाईम्स 26 जुलाई 2015। चपरासी की नौकरी तो दूर, 100 रुपये रोज की प्रायवेट नौकरी भी हाथ से जाती रही, यह हमारी सरकारों की कारगुजारी का वो नंगा सच है। जिस सुन हर देश ाक्त अपने आपको ठगा सा महसूस करता होगा। हमारे बीच मौका था कारगिल विजय दिवस पर शहीदो एवं सैनिको के स मान का जिसका आयोजन सत्यार्थ समूह और प्रेस क्लब शिवपुरी द्वारा म.प्र. के शिवपुरी जिला मु यालय स्थित गांधी सेवा आश्रम में किया गया जिसमें जिले भर के पूर्व सैनिको सहित शहर के सम्रान्त लेागों को आमंत्रित किया गया था, जिसमें वर्ष 2013 में सरहद पर शहीद हो, सर काटने वाले सुधाकर सिंह के पिता सच्चदानन्द सिंह निवासी ग्राम गढ़ोली जिला सीधी म.प्र. को भी आमंत्रित किया गया जिनका शॉल श्रीफल भेंट कर स मान किया गया।


इस मौके पर शहीद सुधाकर के पिता सच्चदानन्द ने विलेज टाई स स पादक, वीरेन्द्र शर्मा भुल्ले विशेष चर्चा के दौरान जो व्यथा-कथा शहीद परिवार की सुनाई वह बड़ी ही दर्दनाक और इन्सानियत को शर्मसार करने वाली थी जो सरकारों की घटिया हरकतो की ऐसी ल बी चौड़ी फैरिस्त है जो शायद ही और कहीं देखने सुनने मिले।

उन्होंने कहा कि मेरे बेटे के शहीद होने के उपरान्त केन्द्र सरकार के रक्षा राज्य मंत्री जितेन्द्र भवर आये जिन्होंने 5 लाख रुपये और जे.पी. सिंगरौली में नौकरी की घोषणा की। प्रभारी मंत्री नागेन्द्र सिंह ने भी नौकरी के लिये म.प्र. के मु यमंत्री को नोट सीट लिखी। मगर न तो 5 लाख ही मिले न ही कोई नौकरी, जे.पी. सिंगरौली ने भी 100 रुपये रोज पर जूनियर सुपरबाइजर का ऑफर किया कुछ दिन बाद वह भी जाता रहा। अब शहीद सुधाकर की मां बेटे के वियोग में विक्षिप्त सी है। बड़ा भाई सतेन्द्र जिसे चपरासी तक की नौकरी नसीब न हो सकी, इस म.प्र. सरकार आज वह मेरे साथ खेती  किसानी करता है, दो बहिने विभा, प्रभा अपने ससुराल में है।

जब सच्चानन्द से पूछा गया कि सुधाकर के शहीद उपरान्त कुछ तो सरकार ने दिया होगा ? इस पर उनका सपाट सा जबाव था 2 लाख 75 हजार रुपये जो सुधाकर के फंण्ड के थे।

बहरहॉल बड़े ही शर्म ही नहीं बड़ी ग भीर बात है जिस दल ने चुनावों के दौरान सैनिको के सर काट ले जाने की घटना को दोनो हाथो से भुनाया, जो आज केन्द्र सरकार मे है, वह वीर शहीद सुधाकर सिंह के परिवार को भूल गई, व सैनिको की शहीदो पर कन्धा दे अन्तिम यात्राओं में शामिल होने वाली म.प्र. की शिव सरकार भी भूल गई कि शहीद की शहादत का अर्थ क्या होता है और वह भी उसके परिवार जन को खासकर उसके बड़े भाई सतेन्द्र को चपरासी तक की नौकरी नहीं दे सकी। जो सरकार अपने दल की लेागों को उपकृत करने इमरजेन्सी के नाम करोड़ों रुपये फंूक रही है, उस सरकार के पास आर्थिक मदद या फिर नौकरी देने का अधिकार न होना सबसे बड़े शर्म की बात है। जिस पर विचार स्वभाविक है। मगर सच्चदानन्द की जुबानी इस बात के लिये काफी है कि देश की राजनीति, सियासत, दल, नागरिक, आर्थिक किस दिशा की ओर बढ़ रहे है। 

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