लोकतंत्र पर हावी भीड़ तंत्र, व्यवस्था बनी तमाशबीन

व्ही.एस.भुल्ले। तमाशबीन व्यवस्था के बीच जिस तरह से भीड़ तंत्र लेाकतंत्र पर हावी है वह इन्सानियत  के लिये शुभसंकेत नहीं, न ही लेाकतंत्र के लिये ठीक, कारण साफ है कि व्यवस्था भी अब धीरे-धीरे इसी भीड़ तंत्र का भाग बन लेाकतंत्र को रौधने पर मजबूर है।


इस महामारी से निवटने जरुरी है पहले लेाकतंात्रिक व्यवस्था को समझ लिया जाये।
आज हमारे देश मे जो लेाकतंात्रिक व्यवस्था है। उसके तहत आम जनता को हर 5 वर्ष में या सरकार भंग हो जाने की स्थति में अपने मत द्वारा स्वयं की भावना अनुरुप लेाकप्रिय सरकार चुनने का अधिकार है।

जो जनभावना अनुरुप नीति बना आम जन के कल्याण का कार्य, कार्यपालिका से करा सके। विवाद या कानून की अज्ञानता की स्थति में न्यायालय उन कानूनो की व्या या कर सके। जो संविधान में उल्लेखित है। वहीं लेाकतंत्र में अघोषित रुप से एक वर्ग या संस्थाऐ, विचार अभिव्यक्ति के नाम लेाकतंात्रिक संस्थाओं की कमजोरी या उनके प्रयास की समीक्षा या सूचना प्रसारित कर अपने कत्र्तव्य का निर्वहन करती है। जिसे लेाग चौथा स्त भ भी कहते है।

कहने का तात्पर्य कि लेाकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाये है वर्ग, समाज लेाग भी है। मगर आज की स्थति में वह न कापिक साबित हो रहे है क्योंकि हमारे महान लेाकतंत्र में भीड़ तंत्र हावी और सत्ता लेालुप साम्राज्यवादियो का झुन्ड तैयार हो रहा है।  जिसका परिणाम है कि अगर अस्पताल में कोई मर जाये तो तोडफ़ोड़, हुड़दंग कोई ऐक्सीडेन्ट में मर जाये तो तोडफ़ोड़, हुड़दंग कोई किसी नीति से असहमत कुछ लेाग हो तो तोड़ फोड़, हुड़दंग यहां तक कि विचारों व धर्म की बिना पर भी तोडफ़ोड़, हुड़दंग हो जाये तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी, मगर व्यवस्था है कि तमाशबीन बन अपने कत्र्तव्य की इतश्री में लगी है।

इससे बड़ा उदाहरण भीड़तंत्र का और क्या होगा कि जिन लेाकतंत्र के मन्दिरों नियम कानून बनाये जाते है वहां भी आज कल भीड़ तंत्र ही हावी है। जिसका परिणाम कि देश और देश के नागरिकों के कल्याण हेतु बनने वाले कानून बनने से पूर्व ही हुड़दंग, बहस या बर्हिगमन का शिकार हो जातेे है।
देखना होगा कि देश जनता लेाकतंत्र में उपजी समस्या के क्या निदान देश के सामने लेकर आती है।

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