भ्रष्टाचार आग में झुलसती पीढिय़ा... ?

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज 
भैया- गर मने भी मौका मिला तो खेल, स्पेक्ट्रम, खदान और हारी नाक का बाल बने व्यापाम से भी बड़ा घोटाला ले आऊंगा, और हाथो हाथ हारे शमसान में ही चांदी, सोने की ईटो में हीरा जडि़त चबुतरा स्वयं की अत्येष्टि हेतु बनवाऊंगा। बशीयत भी ऐसी कि सबसे पहले नोटो की गड्डी फिर चन्दन की लकड़ी शुद्ध घी में डूबे कन्डो से पार्थिक शरीर को ढकवा, अन्तिम क्रिया कराऊंगा।
अन्तिम क्रिया कर्म भी ऐसा कि अपनी याद ही नहीं, स्मृति में बड़े महान मूड़धन्यो की मदद से तैरही, पटा, पिंण्डदान योजना चलाऊंगा। जिससे हारी काठी से निकली रुह भले ही, तरे न तरे, हारे गरीब की आत्मायें तो कम से कम तर जायेगी। जिनके पुरखो की रुह आज भी न तर सकी, कम से कम हारी चलाई योजना से उन सबकी, सब रुहे तर जायेगी। तेरही से हारे जैसे लेागों की आत्मा को आत्म शान्ति, तो पटा से पित्र तृप्त, तो पिंण्डदान से पुर ाों की आत्मा तर जायेगी। बोल भैया कैसी रही ?
भैये- मुये चुप कर मृतको की आत्मा तुझे आशीष वचन, आर्शीवाद दे न दे। मगर मने इतना जाड़ू, गर सुन लिया भाई लेागों  ने तो मृत आत्माओं और पुरखों का तरना तो दूर की कोणी थारी काठी अवश्य जीते जिन्दा निगल ली जायेगी।
भैया- मगर मैंने ऐसा क्या किया है, मने तो हारे विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हाथो हाथ अपने हित में लाभ ले रहा हूं, न ही कोई घोटाला न ही किसी घोटाले बाज को कोई सहयोग कर रहा हूं। न ही भाया जाप्ते में मने कोई व्यान दे रहा हूं।
भैये- बात तो थारी सो आने सच मगर विघन सन्तोषियों का कै करु, जो बात बात में घपले घोटालो की खबर ले आते है। और बैवजह ही हारी व्यवस्था में फैली गन्दगी पर मातम मनाते है।
भैया- ऐसे में मने तो हारे भाई केजरी की बात सच लागे, अन्ना के आन्दोलन में भाई सुस्ता-सुस्ता कर बोल्या कि ये सब चोर है, आपस में मिले हुये है तो क्या गलत था ?
भैये- मगर मने उस कलंक का कै करु जो कलंक हारे म.प्र. पर व्यापम को लेकर लगा है। सुना है व्यापम घोटाले में मरने वाला का आंकड़ा 42 के पार हो चुका है। बैचारे मरने वालो के घर चीत, पुकार, मातम तो एस.टी.एफ को लेकर कोहराम मचा है। अब सच क्या है ये तो ऊपर वाला ही जाने, मगर जब से व्यापम का भूत कै निकला है कोई न कोई मर रहा है। आखिर म.प्र. का निजाम भी तो बिहार में नकली डिग्री पर नौकरी हासिल करने वालो की तरह व्यापम में घपला करने वालो या घपले का लाभ उठाने वालो को भूल सुधार मौका दे सकता था। तो हारे प्रदेश में इस तरह की हाय तौबा न होती। अब तू ही बता कि  इन शौक और मातमो से हारा प्रदेश कैसे बचे।
भैया- सुडऩा चावे तो सुन, जो आया है तो जायेगा। अगर प्रकृति के सिद्धान्त के विरुद्ध किसी ने कुछ किया है तो उसे भुगतना तो पढ़ेगा ही, भले ही वह अपराध अनजाने में या जानबूझ कर किया हो। मगर इन्सानियत कहती है और हमारे कानून की भावना भी रहती है कि सौ दोषी छूट जाये मगर एक निर्दोष को भी सजा नही होनी चाहिए।
ौये- मने जाड़ू थारे और थारे जैसे चाटूकारों को, अब देखना कि कानून के मददगारों पर सरेयाम गोलियां चल रही है रातो रात सिपारी वालो की गुमटियां, दुकान ही नहीं सरेयाम प्रायवेट लिमिटेड चल रही है।
कै थारे को बाबा के गवाह और व्यापम में फसे लेागों की मौते नहीं दिख रही, फिर भी थारी आस्था हारे कानून की पवित्र भावना पर टिकी है। कान खोलकर सुन ले, स्वयं भू लेाकतंत्र का चौथा स्त भ कहलाने वालो हकीकत से मुंह छिपा, मौज उड़ाने वालो आज बैचारे मरने वालो की बारी है तो कल उनकी तरह ही तु हारी भी ऐसी ही हालत होने वाली है न फिर किसी को आस्था, न ही फिर कोई भी भावना सच को बचाने वाली है।
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