हमारी मूल शिक्षा में छिपा है, खुशहाली का राज

व्ही.एस.भुल्ले। 67 वर्ष की आजादी के बावजूद स्वयं की संस्कृति अनुरुप शिक्षा नीति का देश में न बन पाना देशवासियों का दुर्भाग्य और सतत सत्ता में बने रहने का स्वार्थ पालने वालो का सबसे बड़ा अपराध है। जिसे समुचा देश एक बड़े गुनाह के रुप में देखने पर मजबूर है। काश आजाद भारत में मैकाले की शिक्षा नीति विरुद्ध देश की अपनी संस्कृति अनुरुप शिक्षा नीति बनी होती, तो आज यह दिन देश को न देखना पड़ता।

इससे बड़ा दुभागर््य किसी भी देश का क्या हो सकता है ? जिसके समुचे भू-भाग को प्रकृति द्वारा प्राकृतिक रुप नहीं बौद्धिक और शारीरिक रुप से धन धान और स पन्न खुशहाल बनाया गया है। यह सच है मगर कड़वा, विश्व में ऐसा एक भी भू-भाग नहीं है, जहां प्रकृति की इतनी सारी खूबियां उपलब्धता स पन्नता हो, जहां इन्सानियत को सर्वोपरि मान पूजा जाता हो, धर्म जो भी हो इसकी संस्कृति ऐसी कि हर व्यक्ति खुशहाल स पन्न हुआ करता था। आध्यात्म ऐसा कि लेाग विश्व गुरु मान अनुशरण करने पर मजबूर थे। भारत वह तपोभूमि रही है और आज भी है, जहां चमत्कारिक प्रतिभायें जन्म लेती रही है और आज भी ले रही है। जो समय-समय पर मानव जाति को मार्गदर्शित करती रही है।

मगर जिन व्यापारियों ने धन उगाने सेवा, व्यापार के नाम बड़ी चालाकी से इसे गुलाम बना डेढ़ दो सौ साल तक लूटा वह अपने निहित स्वार्थो के लिये, शिक्षा के नाम ऐसा बीज वो गये, जिसके चलते हम आज भी सेवा, व्यापार के नाम लुट रहे है। और अब हमें कोई विदेशी नहीं, बल्कि विदेशियों के औपचारिक अनौपचारिक लाभ के लिये हमें बड़ी ही बेरहमी से लूट रहे है। मगर अब तो हालत ये है कि अंग्रेज तो सेवा, व्यापार के नाम शुल्क बसूली कर लूटते थे। मगर हमारे अपनो के हाथ अब न तो सेवा बची, न ही व्यापार, सिर्फ और सिर्फ आज धन लालचियों का हुजूम सेवा और व्यापार के नाम सारी इन्सानियत, नैतिकता को धताबता अनैतिक और हैवानियत भरा शोषण कर रहे।

मैकाले ने तो 150 वर्ष पूर्व केवल गुलाम बनाये रखने शिक्षा नीति दी, मगर हमारे अपने तो ब्रितानिया हुकूमत को मात कर शोषण लूट के सारे रिकार्ड तोड़ कोसो दूर निकल चुके है। जहां से लौटने का फिलहॉल दूर-दूर तक कोई रास्ता नजर नहीं आता है।

बेहतर हो हम हमारी गुरुकुल व्यवस्था शिक्षा पद्धति के माध्ययम से अपनी उस संस्कृति को पुर्नजीवित करने की शुरुआत करे जिससे देश व देश के नागरिक खुशहाल स पन्न बन सके। और यह तभी स भव है जब हमारी शिक्षा नीति में सिरे से बदलाव हो, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की रीढ़ उसकी शिक्षा नीति होती है। और मैकाले की नीति ने यह साबित कर दिया, जिसके चलते हमारी वर्तमान शिक्षा नीति से या तो सामंत साम्राज्यवादी निकल रहे है या फिर नौकर और गुलाम। जिसके चलते देश में अपने-अपने तरीके से शोषण, लूटमार और साम्राज्य बढ़ाने का कारवां चल निकला है, जहां कोई किसी की सुनने तैयार नहीं। कोई अकूत धन तो कोई सतत सत्ता में बना रहना चाहता। जिसके लिये कोई भी कुछ भी करने तैयार है।

फिलहॉल तो जो हाल देश व देश वासियो का बन चुका है वह देखने योग्य है। इससे बड़ा और क्या दुर्भाग्य होगा कि पुलिस की तेहरीर आज भी न तो हमारी मातृ भाषा हिन्दी न ही अंग्रेजी में लिखी जाती है, बल्कि जिस भाषा का उपयोग होता है वह ब्रिजानियाँ हुकूमत की कही जा सकती है। काश हम हमारी वर्तमान शिक्षा नीति बदल, उसे नये सिरे से बना पाये तो बेहतर होगा। 


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