इस्तीफों की सियासत, जनभावना के विरुद्ध जंग...?

व्ही.एस.भुल्ले @तीरंदाज
भैया- मने न दूं इस्तीफा, विस्तीफा जब हारा समुचा कुनवा चिल्ला-चिल्ला कर कह चुका है कि इस्तीफा नहीं होगा फिर भी बावले चिल्लाये जा रहे है और हारे महान मानसून सत्र की पूर्व संध्या पर माननीयों को घेरने औजार हथियार पंजाये जा रहे है। कै भाया वाक्य में ही इस्तीफे हो जायेगें और चिल्लाने वालो के भी मुंह बन्द हो जायेगें। नहीं तो कै होगा हारे जनधन, जनसुरक्षा बीमा, पेन्शन, डिजिटल स्केल इंण्डिया का। 

भैये- जनधन, जनसुरक्षा, बीमा, पेन्शन, डिजिटल, स्केल इंण्डिया का मसला नहीं, मसला तो हारे रण बाकुरे ललित भाई को लेकर राजस्थान और शिव सरकार के राज्य म.प्र. में हुये व्यापम घोटाले का है। सो पक्ष-विपक्ष के बीच इस्तीफे को लेकर तलवार खिची हुई है। दोनो ही ओर से तर्क कुतर्क की फेरिस्ते तैयार हो रही है। अब ऐसे में थारी चिन्ता वाजिब है। 
भैया- तो क्या इन चिल्लाने वालो की आस्था अब लेाकतांत्रिक व्यवस्था से जाती रही, इतना तो मने भी जाड़ू जिसका जनाधार, उसकी पूरे 5 वर्ष सरकार अब ऐसे में कुछ सही, गलत, घपले, घोटाले हो गये हो, तो हर्ज ही क्या ? कम से कम 5 वर्ष तक तो जनाधार का स मान होना चाहिए या फिर चिल्लाने के बजाये सदन में विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहिए। जिससे चुने हुये जनप्रतिनिधि लेाकतंत्र के मन्दिर में नैतिकता के आधार पर पुन: मतदान कर सदन और सरकार का मुखिया चुन सके। और लेाकतांत्रिक तरीके से दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। आखिर हारे मु यमङ्क्षत्रयों से ही नैतिकता का तकाजा क्यों ? वे भी तो नैतिकता दिखायें जिन्होंने इन माननीयों मु यमंत्रियों को चुना और सदन में माननीयों के साथ पूरी निष्ठा ईमानदारी से ईश्वर को साक्षी मान शपथ ली है। 
क्योंकि हारे महान सदनो में चाहे वह संसद हो या विधानसभा दलीय पहचान के आधार पर मतदान नहीं होता। बल्कि मुद्दे के आधार पर पक्ष-विपक्ष में मतदान होता है। फिर जब मसला प्रदेशों का है। फिर देश के सर्वोच्च सदन में हंगामा क्यों ? आखिर प्रदेशों के नाम, देश के प्रमुख माननीय की घेरा बन्दी क्यों ? 
भैये- तने तो बावला शै तू कै जाड़े राजनीति के गूड़ रहस्य जब भाई लेाग आजादी से लेकर आज तक नहीं समझ सके हारे लेाकतांत्रिक ताने बाने को तो थारे को क्या ? 
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा, लगता तने भी भीष्म प्रतिज्ञा से बंधा है। तभी तो तू भी अर्र-बर्र बोल रिया शै। लगता है थारे को हारे महान ग्रन्थ गीता का ठीक से ज्ञान नहीं, महाभारत में बड़े-बड़े बल शाली इसलिये धरासायी नहीं हुये कि वह मारने वालो से, कम बलशाली थे। अब्बल वह इसलिये धरासायी हुये कि वह नीति को छोड़ ,अनीति के साथ खड़े थे। सो भाया मने तो बोल्यू ।
यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत: ।
अभ्युतानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृज्याम्यहम् ।।
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