कॉग्रेस : भारत भ्रमण से गुरेज क्यों ?

व्ही.एस.भुल्ले। कॉग्रेस आलाकमान की रणनीति का सच क्या है ? यह तो कॉग्रेस ही जाने मगर संगठनात्मक सुस्ती, निर्धारित नीति और भारत भ्रमण से गुरेज को लेकर कॉग्रेस भले ही आत्म मुग्ध नजर आती हो, मगर कॉग्रेस के शुभचिन्तकों के आगे अवश्य कई सवाल है। अगर समय रहते कॉग्रेस पूर्व की भांति इन सवालों का जबाव देने में अक्षम रही तो वह दिन दूर नहीं जब 54 सीटो पर सन्तुष्टि करने वाली कॉग्रेस का आने वाले समय में अलग ही स्वरुप नजर आये।

ऐसा नहीं कि कॉग्रेस की करारी हार से आलाकमान ने सबक न लिया हो, मगर जिस तरह से कॉग्रेस के भविष्य की शुरुआत भारत भ्रमण को लेकर हुई है। चाहे वह भगवान केदार नाथ, पंजाब, म.प्र., उत्तरप्रदेश, म.प्र. सहित अब दिल्ली की रेड़ी यात्राऐं हो रही है। जो रणनीति के आभाव में सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती।

कारण साफ है कि न तो ठीक से संगठनात्मक वैचारिक रणनीति पर काम हुआ, न ही भारत भ्रमण की परिणाम मूलक रणनीति तैयार हो सकी। अगर चर्चाओं की माने तो रा.ज.ग. सरकार में कॉग्रेस के सामने भी सुनियोजित तरीके से वहीं संकट है, जो कॉग्रेस या उसके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय क्षेत्रीय दलो के सामने होता था, और आज भी है।

चाहे वह ज मू काश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, तमिलानायडू, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, केरल, असम में सत्ता धारी दल रहे हो, मगर वह सत्ता में रहते हुये भी कभी अन्य प्रदेशों में अपना विस्तार नहीं कर सके। कारण जो भी रहा हो, मगर सच क्या है, यह तो वह दल ही जाने।
ऐसी ही स्थिति आज भारत के सबसे बड़े राजनैतिक दल की जो स्थिति नजर आ रही है, वह भी बगैर किसी कारण के जबकि आज कॉग्रेस के पास राहुल जैसा युवा चेहरा सामने है और उनके हम उग्र युवा तुर्को की फौज है जो अपने-अपने स्तर पर संघर्ष में जुटी है। मगर न जाने क्यों आलाकमान निर्णय लेने में संकोच कर रहा है।

बहरहॉल जो भी हो, एक वर्ष का समय गुजर चुका है अगर ऐसा ही रहा तो, निश्चित ही कॉग्रेस मुक्त सपने देखने वालो के सपने सच होते देर न होगी। और कॉग्रेस वर्ष 2014 के चुनावों के परिणामों के तरह कहीं हाथ मलती ही न रह जाये और मैदान में एक नई कॉग्रेस ही खड़ी नजर आये, चेहरा जो भी हो, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 


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